भिक्षाचरः। सेनाचरः। आदायेति ल्यबन्तम्, आदायचरः॥
७९३- भिक्षासेनादायेषु च। भिक्षा च सेना च आदायश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वो भिक्षासेनादायाः, तेषु भिक्षासेनादायेषु। भिक्षासेनादायेषु सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। चरेष्टः से चरेः, टः और सुपि स्थः से वचनविपरिणाम करके सुप्सु की अनुवृत्ति आती है साथ ही धातोः, प्रत्ययः, परश्च इन पदों का अधिकार है।
भिक्षा, सेना और आदाय इन सुबन्तों के उपपद होने पर चर्-धातु से ट-प्रत्यय होता है।
चरेष्टः की तरह यहाँ अधिकरण अर्थात् सप्तमी विभक्ति ही हो, ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है किन्तु आवश्यकता के अनुसार कोई भी सुप् विभक्ति भिक्षा, सेना, आदाय में होनी चाहिए। आदाय ल्यप् प्रत्ययान्त अव्यय है। अव्यय में भी विभक्ति तो आती ही है।
भिक्षाचरः। भिक्षां चरतीति, भिक्षा के लिए घूमने वाला।
सेनाचरः। सेनां चरतीति, सेना मे जाने वाला।
आदायचरः। आदाय चरतीति, लेकर के चलने वाला।
उपर्युक्त तीनों प्रयोगों में उपपदसंज्ञा करके ट-प्रत्यय, उपपदसमास करके विद्यमान विभक्ति का लुक् करके वर्णसम्मेलन करके सु विभक्ति आती है और उसका रुत्व आदि कार्य करके तीनों रूप सिद्ध हो जाते हैं।