यु-वु-एतयोरनाकौ स्तः। कारकः। कर्ता।
अब पूर्वकृदन्तप्रकरण प्रारम्भ होता है। कृत्यप्रकरण के बाद कृदन्त का यह दूसरा प्रकरण है। इस प्रकरण में भी धातोः, प्रत्यय और परश्च इन तीन सूत्रों का अधिकार है। जो भी प्रत्यय होंगे, वे सब धातु से परे ही विहित होंगे। कृदन्त की कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा होती है और उसके बाद सु, औ, जस् आदि विभक्तियाँ भी आती हैं तथा सातों विभक्तियों में रूप बनते हैं। यदि शब्द विशेषण है तो विशेष्य के अनुसार लिङ्ग, विभक्ति और वचन होते हैं। कहीं-कहीं किसी प्रत्यय के लगने के बाद कोई शब्द एक निश्चित लिङ्ग वाला भी होता है। जैसे प्रच्छ और विच्छ धातुओं से नङ् प्रत्यय होने पर प्रश्न और विश्न ये शब्द नित्य पुँल्लिङ्गी ही होते हैं। इस प्रकरण के प्रत्यय धातु से विहित होने के कारण शित् होंगे तो सार्वधातुकसंज्ञक अन्यथा आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञक होंगे। वलादि-आर्धधातुक होने पर यदि धातु सेट् है तो इट् होगा और अनिट् है तो इट् नहीं होगा। इस प्रकरण में सामान्यतया कर्तरि कृत् से कर्ता अर्थ में प्रत्यय किये गये हैं और जहाँ अर्थ बदल जाता है वहाँ सूत्रों से अर्थनिर्देश किया है। तो आइये, इस प्रकरण में प्रवेश करते हैं।
७८५- युवोरनाकौ। युश्च वुश्च तयोः समाहारद्वन्द्वः, युवुः, सौत्रं पुंस्त्वं, तस्य युवोः। युवोः षष्ठ्यन्तम्, अनाकौ प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।
यु और वु के स्थान पर क्रमशः अन और अक आदेश होते हैं।
ये दोनों आदेश अदन्त हैं। अन और अक ये दोनों ही अनेकाल् हैं, अतः अनेकाल्लित् सर्वस्य के द्वारा सर्वादेश होते हैं।
कारकः। करोतीति। करने वाला। डुकृञ् करणे। कृ धातु से ण्वुलतृचौ से ण्वुल प्रत्यय, अनुबन्धलोप, वु बचा, कृ+वु बना। वु के स्थान पर युवोरनाकौ से अकादेश हुआ। कृ+अक बना। अक की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा हुई किन्तु यहाँ आर्धधातुकसंज्ञा का फल नहीं है, अन्य कतिपय प्रयोगों में होता है। ण्वुल् प्रत्यय णित् है। स्थानिवद्-भाव से णित्व अक में भी आ गया। अतः अचो ञ्णिति से कृ को उरण् रपरः की सहायता से आर्-वृद्धि हुई, कृ+आर्+अक बना, वर्णसम्मेलन हुआ- कारक ऐसा अकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्द बना। कारक की प्रातिपदिकसंज्ञा और सु प्रत्यय आने के बाद रुत्वविसर्ग करके रामः की तरह कारकः भी सिद्ध हुआ। अब कारक-शब्द के सातों विभक्ति के रूपों को देखते हैं-
विभक्ति
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमा
कारकः
कारकौ
कारकाः
द्वितीया
कारकम्
कारकौ
कारकान्
तृतीया
कारकेण
कारकाभ्याम्
कारकैः
चतुर्थी
कारकाय
कारकाभ्याम्
कारकेभ्यः
पञ्चमी
कारकात्-द्
कारकाभ्याम्
कारकेभ्यः
षष्ठी
कारकस्य
कारकयोः
कारकाणाम्
सप्तमी
कारके
कारकयोः
कारकेषु
सम्बोधन
हे कारक!
हे कारकौ! हे कारकाः!
स्त्रीलिङ्ग में टाप् और इत्व करके कारिका बनता है और उसके रूप रमा शब्द की तरह बनते हैं। जैसे- कारिका, कारिके, कारिकाः, कारिकाम्, कारिके, कारिकाः आदि।
नपुंसकलिङ्ग में ज्ञानशब्द की तरह रूप चलते हैं। जैसे- कारकम्, कारके, कारकाणि आदि।
कर्ता। करोतीति कर्ता। कृ-धातु से ही ण्वुलतृचौ से तृच् प्रत्यय करके चकार की इत्संज्ञा और लोप करके तृ शेष बचा। तृ की आर्धधातुकसंज्ञा हुई और कृ का सार्वधातुकार्धधातुकयोः से अर्-गुण हुआ, कृ+अर्+तृ बना, वर्णसम्मेलन हुआ तो कर्तृ ऐसा ऋकारान्त शब्द बना। कर्तृ की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सु विभक्ति आई। इसके बाद ऋकारान्त धातु-शब्द की तरह ऋकार के स्थान पर ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसां च से अनङ् आदेश, अनुबन्धलोप, कर्तृ+अन्+स् बना। वर्णसम्मेलन होकर कर्तन् स् बना। त के अकार की अलोऽन्त्यात्पूर्व उपधा से उपधासंज्ञा करके अप्तृन्तृच्च्वसृनप्तृनेष्टृत्वष्टृक्षतृहोतृ-पोतृप्रशास्तृणाम् से दीर्घ हुआ, कर्तान् स् बना। अपृक्त एकाल् प्रत्ययः से सकार की अपृक्तसंज्ञा करके हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से उसका लोप हुआ, कर्तान् बना। नकार का नलोपेः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप हुआ, कर्ता सिद्ध हुआ।
इस तरह कर्तृ-शब्द के रूप धातृ-शब्द की तरह से बनते हैं। अतः धातृ-शब्द की प्रक्रिया का स्मरण करें, सारे रूप अपने आप बना लेंगे। हम यहाँ पर कर्तृ के सातों विभक्तियों के रूप दे रहे हैं किन्तु आगे सिद्ध किये जाने वाले सभी शब्दों के रूप नहीं दिये जायेंगे, केवल संकेत मात्र किया जायेगा कि इस शब्द के रूप अमुक शब्द की तरह होते हैं। उसके अनुसार आपको अपने आप प्रक्रिया करनी पड़ेगी। अतः सुबन्तप्रक्रिया को आप एक बार पुनः पढ़ लें, समझ लें तो आपको कठिनाई नहीं आयेगी।
कर्तृ-शब्द के पुँल्लिङ्ग के रूप
विभक्ति
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमा
कर्ता
कर्तारौ
कर्तारः
द्वितीया
कर्तारम्
कर्तारौ
कर्तृन्
तृतीया
कर्त्रा
कर्तृभ्याम्
कर्तृभिः
चतुर्थी
कर्त्रे
कर्तृभ्याम्
कर्तृभ्यः
पञ्चमी
कर्तुः
कर्तृभ्याम्
कर्तृभ्यः
षष्ठी
कर्तुः
कर्त्रोः
कर्तृणाम्
सप्तमी
कर्तरि
कर्त्रोः
कर्तृषु
सम्बोधन
हे कर्तः!
हे कर्तारौ!
हे कर्तारः!
स्त्रीलिङ्ग में ऋनेभ्यो डीप् से डीप्, अनुबन्धलोप, यण् होकर कर्त्री-शब्द बन जाता है। इसके रूप नदी-शब्द की तरह चलते हैं। जैसे कर्त्री, कर्त्र्यो, कर्त्र्यः, कर्त्रीम्, कर्त्र्यो, कर्त्रीः आदि।
नपुसंकलिङ्ग में वारि-शब्द की तरह कर्तृ, कर्तृणी, कर्तृणि, कर्तृ, कर्तृणी, कर्तृणि, कर्तृणा, कर्तृभ्याम्, कर्तृभिः आदि रूप बनते हैं।
आपने इस तरह कृ-धातु से ण्वुल् और तृच् प्रत्ययों के लगने से बनने वाले रूपों को देखा। अब इसी तरह निम्नलिखित धातुओं से इन प्रत्ययों को लगाकर रूप बनाइये।
क्र.
धातु
विग्रह
ण्वुल्प्रत्ययान्त रूप
अर्थ
१-
याच्
याचत इति
याचकः
मांगने वाला।
२-
नी
नयतीति
नायकः
ले जाने वाला।
३-
लिख्
लिखतीति
लेखकः
लिखने वाला।
४-
सेव्
सेवत इति
सेवकः
सेवा करने वाला।
५-
दृश्
पश्यतीति
दर्शकः
देखने वाला।
६-
पूञ्
पुनातीति
पावकः
पवित्र करने वाला, अग्नि।
७-
धाव्
धावतीति
धावकः
दौड़ने वाला।
८-
वह्
वहतीति
वाहकः
ढोने वाला
९-
चिन्त्
चिन्तयतीति
चिन्तकः
चिन्तन करने वाला।
१०-
गण्
गणयतीति
गणकः
गिनने वाला।
११-
पाल्
पालयतीति
पालकः
पालन करने वाला।
१२-
पाठि
पाठयतीति
पाठकः
पढ़ाने वाला।
१३-
अध्यापि
अध्यापयतीति
अध्यापकः
पढ़ाने वाला।
अब तृच् प्रत्ययान्त कुछ शब्दों के उदाहरण देखें-
१४-
हृञ्
हरतीति
हर्ता
हरण करने वाला।
१५-
गम्
गच्छतीति
गन्ता
जाने वाला।
१६-
हन्
हन्तीति
हन्ता
मारने वाला।
१७-
भुज्
भुनक्तीति
भोक्ता
खाने वाला।
१८-
श्रु
श्रुणोतीति
श्रोता
सुनने वाला।
१९-
ज्ञा
जानातीति
ज्ञाता
जानने वाला।
२०-
दा
ददातीति
दाता
देने वाला।
२१-
क्री
क्रीणातीति
क्रेता
खरीदने वाला।
२२-
रच्
रचयतीति
रचयिता
रचने वाला।
इन सभी शब्दों के रूप बनाइये और धातुपाठ से धातु देखकर उनसे इन प्रत्ययों को लगाकर कैसे रूप बन सकते हैं, इसका भी प्रयत्न आप करें, आपकी प्रतिभा बढ़ेगी। ७८६- नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः। नन्दिश्च ग्रहिश्च पच् च तेषां समाहारद्वन्द्वो नन्दिग्रहिपच्, नन्दिग्रहिपच् आदिर्येषां ते नन्दिग्रहिपचादयः, तेभ्यो नन्दिग्रहिपचादिभ्यः, द्वन्द्वगर्भो बहुव्रीहिः। ल्युश्च णिनिश्च अच्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वो ल्युणिन्यचः। नन्दिग्रहिपचादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, ल्युणिन्यचः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।