Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 784
ण्वुलतृच्प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
ण्वुल्तृचौ
Aṣṭādhyāyī 3.1.133
Vṛtti Varadarājācārya

धातोरेतौ स्तः। कर्तरि कृदिति कर्त्रर्थे।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७८४- ण्वुलतृचौ। ण्वुल च तृच् च तयोरितरेतरद्वन्द्वः। ण्वुलतृचौ प्रथमान्तम् एकपदमिदं सूत्रम्। धातोः, प्रत्ययः, परश्च इन तीनों सूत्रों का अधिकार है।

धातुमात्र से ण्वुल और तृच् प्रत्यय होते हैं।

ये प्रत्यय कर्तरि कृत् के अनुसार कर्ता अर्थ में ही होंगे। ण्वुल में णकार की चुट् से तथा लकार की हलन्त्यम् से एवं तृच् में चकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है। इत्संज्ञा का फल लोप करना है। प्रत्यय, आगम और आदेशों में इस प्रकार के वर्णों की जो इत्संज्ञा और लोप रूप कार्य करते हैं, उस कार्य को संक्षेप में अनुबन्धलोप कहते हैं। आगे सर्वत्र अनुबन्धलोप से यही समझना चाहिए।