Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 786
ल्यु-णिनि-अच्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः
Aṣṭādhyāyī 3.1.134
Vṛtti Varadarājācārya

नन्द्यादेर्ल्युः, ग्रह्यादेर्णिनिः, पचादेरच् स्यात्।

नन्दयतीति नन्दनः। जनमर्दयतीति जनार्दनः। लवणः। ग्राही। स्थायी।

मन्त्री। पचादिराकृतिगणः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

नन्दि आदि, ग्रहि आदि और पच् आदि धातुओं से क्रमशः ल्यु, णिनि और अच् प्रत्यय होते हैं।

नन्दि आदि, ग्रहि आदि और पच् आदि तीन गणों के धातुओं से ल्यु, णिनि और अच् ये तीन प्रत्यय होते हैं। यथासंख्यमनुदेशः समानाम् के नियम से क्रमशः विधान होने पर नन्दि आदि धातुओं से ल्यु, ग्रहि आदि धातुओं से णिनि और पच् आदि धातुओं से अच् प्रत्यय हो जाते हैं।

ल्यु में लकार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है, यु बचता है और उसके स्थान पर युवोरनाकौ से अन आदेश हो जाता है। इससे अकारान्त शब्द बनता है। णिनि में णकार की चुटू से तथा इकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है, इन् ही शेष रहता है। इस प्रत्यय के लगने के बाद शब्द इन्नन्त बन जाता है जिसके रूप इन्नन्त योगिन् शब्द की तरह बनते हैं। पच् में चकार की इत्संज्ञा होती है। अच्-प्रत्ययान्त शब्द अकारान्त राम-शब्द की तरह होता है।

नन्दनः। नन्दयतीति। प्रसन्न करने वाला। दुनदि समृद्धौ। आदिर्जिटुडवः। इदितो नुम् धातोः। सूत्र में नन्दि ऐसा ण्यन्त निर्देश है। अतः ण्यन्त नन्दि से नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः से ल्यु, अनुबन्धलोप, णेरनिटि से णि का लोप, नन्द्+यु बना। यु के स्थान --

.....

युवोरनाकौ से अन आदेश, नन्द+अन, वर्णसम्मेलन करने पर नन्दन बन गया। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, रुत्वविसर्ग करके राम-शब्द की तरह नन्दनः सिद्ध हुआ।

जनार्दनः। जनमर्दयति। भक्त-जनों को अपने धाम पहुँचाने वाले अथवा दुष्ट जनों का नाश करने वाले भगवान्। जन-शब्दपूर्वक ण्यन्त (अर्द्) अर्दि धातु से ल्यु, णिलोप, अन आदेश होकर जन+अम्+अर्द्+अन बना। जन+अम् की तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् से उपपदसंज्ञा और उपपदमतिङ् से समास होकर कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से अम् का लोप हुआ। इस तरह जन+अर्द्+अन बना। जन+अर्द् में सवर्णदीर्घ और आगे वर्णसम्मेलन होकर जनार्दन बना। सु विभक्ति लगकर जनार्दनः सिद्ध हुआ।

लवणः। लुनातीति। काटने वाला। लूञ् धातु से ल्यु होकर अन आदेश और लू को आर्धधातुकगुण होकर अव् आदेश होने पर लवन बना। नन्दादिगण में लवणः पढ़े जाने के कारण निपातनात् णत्व होकर लवण बना। सु आदि विभक्ति करके लवणः सिद्ध हुआ।

मधुसूदनः। मधुं सूदयति। मधु नामक दैत्य को मारने वाले (विष्णु)। द्वितीयान्त मधु-शब्दपूर्वक ण्यन्त (सूद्) सूदि धातु से ल्यु, णिलोप, अन आदेश होकर मधु+अम्+सूद्+अन बना। मधु+अम् की तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् से उपपदसंज्ञा औरउपपदमतिङ् से समास होकर कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से अम् का लोप हुआ। इस तरह मधु+सूद्+अन बना। वर्णसम्मेलन होकर स्वादिकार्य होने पर मधुसूदनः सिद्ध हुआ।

उक्त प्रक्रिया करने पर ही शुभ् से शोभनः, वृध् से वर्धनः, मद् से मदनः, रम् से रमणः आदि बनते हैं।

ग्राही। गृह्णातीति। ग्रहण करने वाला। ग्रह उपादाने। ग्रह-धातु से नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः से णिनि, अनुबन्धलोप करके इन् बचा। णित् होने के कारण अत उपधायाः से धातु के उपधाभूत अकार की वृद्धि हुई, ग्राह्+इन्, वर्णसम्मेलन ग्राहिन् बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, सौ च से दीर्घ, सु का लोप, नकार का लोप करके योगी की तरह ग्राही बनाइये। इसके रूप भी योगी की तरह ग्राही, ग्राहिणौ, ग्राहिणः, ग्राहिणम्, ग्राहिणौ, ग्राहिणः आदि बनते हैं।

स्थायी। तिष्ठतीति। स्थित रहने वाला। स्था(ष्ठा गतिनिवृत्तौ)धातु से णिनि, अनुबन्धलोप करके आतो युक् चिण्कृतोः से युक् आगम, अनुबन्धलोप करके स्था+य्+इन् बना। वर्णसम्मेलन करके स्थायिन् बनाकर सु विभक्ति, उसका हल्ड्याब्भ्यः० से लोप, उपधादीर्घ, नकार का लोप आदि करके स्थायी सिद्ध होता है। आगे स्थायिनौ, स्थायिनः आदि बनते हैं।

मन्त्री। मन्त्रणा करने वाला। मन्त्रि गुप्तभाषणे। मन्त्रयत इति विग्रह में ण्यन्त मन्त्रि-धातु से णिनि करके णिलोप करके मन्त्रिन् बनाकर मन्त्री, निपूर्वक वस्-धातु निवसतीति विग्रह में निवासिन् बनाकर निवासी, उत्पूर्वक सह से उत्साही आदि रूप बनाइये।

पचः। पचतीति। पकाने वाला अर्थात् जो पकाता है। डुपचष् पाके। पच् से नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः से अच् करके पच बनता है, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, रुत्वविसर्ग करके अकारान्त रामः की तरह पचः सिद्ध हो जाता है। इसी तरह वच् से वचः,

वद् से वदः, पत् से पतः आदि बनते हैं। इसी प्रकार दीव्यतीति, जो अपने गुण एवं कर्मों से चमके वह देवः तथा पचादिगण में देवट् यह प्रातिपदिक टित् पठित होने से स्त्रीत्वविवक्षा में टिड्ढाणञ्० से ङीप् करके देवी आदि भी बनाने का प्रयत्न करें।

पचादि आकृतिगण है। इसमें कितने धातु आते हैं, ऐसा कोई निश्चित नियम नहीं है। आकृति अर्थात् सिद्ध रूपों को देखकर पचादिगणीय होने का अनुमान मात्र लगाया जा सकता है। तात्पर्य यह है कि जहाँ-जहाँ भी कर्ता अर्थ में अच्-प्रत्यय लगा रूप देखा जाय तो समझ लेना चाहिए कि यह पचादिगणीय है।