Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 33
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VṛttiGovind
LSK 783
निपातनार्थं विधिसूत्रम्
भोज्यं भक्ष्ये
Aṣṭādhyāyī 7.3.69
Vṛtti Varadarājācārya

भोग्यमन्यत्।

इति कृदन्ते कृत्यप्रक्रिया॥३३॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७८३- भोज्यं भक्ष्ये। भोज्यं प्रथमान्तं, भक्ष्ये सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।

भक्ष्य अर्थात् खाद्य अर्थ हो तो भुज् धातु से भोज्य का निपातन होता है।

( भुज पालनाभ्यवहारयोः ) भुज् के दो अर्थ हैं, पालन और खाना। दोनों अर्थों में से ण्यत् होकर जकार को कुत्व प्राप्त था। भोज्यं भक्ष्ये से भक्ष्य अर्थ में कुत्व के अभाव का निपातन किया गया अर्थात् भुज् धातु से ण्यत् होने पर भक्ष्य अर्थ में कुत्व का अभाव होकर भोज्यम् बनता है और पालन अर्थ में कुत्व होकर भोग्यम् बनता है।

भोज्यम्। भुज पालनाभ्यवहारयोः। भुज् से ण्यत्, अनुबन्धलोप, उपधागुण करके भोज्य बना और स्वादिकार्य करके भोज्यम् सिद्ध हो जाता है।

सभी धातुओं से तव्यत्, अनीयर् होते हैं। ये असमान रूप वाले होने से किसी के नित्य से बाधक नहीं होते हैं। क्यप्, यत्, ण्यत् आदि सरूप प्रत्यय होने से आपस में एक दूसरे के नित्य से बाधक होते हैं। जहाँ क्यप् हुआ वहाँ ण्यत् नहीं हो सकता और जहाँ ण्यत् हुआ वहाँ यत् नहीं हो सकता किन्तु तव्यत्, अनीयर के बाद भी क्यप्, या ण्यत् अथवा यत् हो सकते हैं। जैसे- पठितव्यम्, पठनीयनम्, पाठ्यम्। गन्तव्यम्, गमनीयम्, गम्यम्। कर्तव्यम्, करणीयम्, कार्यम्। कथितव्यम्, कथनीयम्, कथ्यम्। खादितव्यम्, खादनीयम्, खाद्यम्।

परीक्षा

१-

तिङन्त और कृदन्त में अन्तर बताइये।

२-

तिङन्तप्रकरण की किन्हीं पन्द्रह धातुओं के तव्यत् और अनीयर् प्रत्यय लगाकर रूप बनाइये।

१५

३-

कृत्प्रत्यय करने वाले सूत्रों में किन-किन सूत्रों का अधिकार रहता है?

४-

कृत्यप्रक्रिया के वाऽसरूपोऽस्त्रियाम् और कृत्यलुटो बहुलम् इन दो सूत्रों की व्याख्या करें।

२०

५-

ऋहलोर्ण्यत् और अचो यत् में बाध्यबाधक भाव स्पष्ट करें।

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का कृदन्त-कृत्यप्रकरण पूर्ण हुआ।

अथ पूर्वकृदन्तम्