Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 33
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VṛttiGovind
LSK 782
वृद्धिविधायकं विधिसूत्रम्
मृजेर्वृद्धिः
Aṣṭādhyāyī 7.2.114
Vṛtti Varadarājācārya

मृजेरिको वृद्धिः सार्वधातुकार्धधातुकयोः। मार्ग्यः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७८२- मृजेर्वृद्धिः। मृजेः षष्ठ्यन्तं, वृद्धिः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इको गुणवृद्धी से इकः यह षष्ठ्यन्त पद उपस्थित होता है।

सार्वधातुक और आर्धधातुक के परे होने पर मृज् के इक् को गुण होता है।

यह सातवें अध्याय का सूत्र है और इस सूत्र में किस के परे होने पर वृद्धि होती है, यह नहीं बताया गया है किन्तु धातोः कार्यमुच्यमानं तत्प्रत्यये भवति अर्थात् यदि धातु को कोई कार्य होता है तो वह या तो सार्वधातुक प्रत्यय के परे होगा या तो आर्धधातुक प्रत्यय के परे होगा।

सार्वधातुक या आर्धधातुक के परे होने पर मृज् के इक् की वृद्धि होगी।

मार्ग्यः। मृज् से क्यप् न होने के पक्ष में ऋहलोर्ण्यत् से ण्यत् हुआ और चजोः कु घिण्ण्यतोः से जकार को कुत्व होकर गकार हुआ और मृजेर्वृद्धिः से उपधाभूत ऋकार को वृद्धि होकर मार्ग्य बना। विभक्तिकार्य होकर मार्ग्यः सिद्ध हुआ।