Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 33
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VṛttiGovind
LSK 780
ण्यत्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
ऋहलोर्ण्यत्
Aṣṭādhyāyī 3.1.124
Vṛtti Varadarājācārya

ऋवर्णान्ताद्धलन्ताच्च धातोर्ण्यत्। कार्यम्। हार्यम्। धार्यम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७८०- ऋहलोण्यत्। ऋहलोः पञ्चम्यर्थे षष्ठी, ण्यत् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।

ऋवर्णान्त और हलन्त धातुओं से ण्यत् प्रत्यय होता है।

णकार और तकार की इत्संज्ञा होती है। णित् का फल वृद्धि आदि है।

कार्यम्। डुकृञ् करणे, कृ-धातु से ऋहलोण्यत् से ण्यत् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, कृ+य में य के णित् होने के कारण अचो ञ्णिति से रपर-सहित आर्-वृद्धि, कृ+आर्+य, वर्णसम्मेलन, कार्य, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु विभक्ति, अमादेश, पूर्वरूप करके कार्यम् सिद्ध हुआ।

हार्यम्। धार्यम्। (हृञ् हरणे) हृ धातु तथा (धृञ् धारणे) धृ धातु से इसी प्रकार ण्यत्, वृद्धि, सु, अम्, पूर्वरूप करके हार्यम् और धार्यम् बनाइये।