Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 33
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VṛttiGovind
LSK 779
वैकल्पिकक्यविधायकं विधिसूत्रम्
मृजेर्विभाषा
Aṣṭādhyāyī 3.1.113
Vṛtti Varadarājācārya

मृजेः क्यव्वा। मृज्यः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७७९- मृजेर्विभाषा। मृजेः पञ्चम्यन्तं, विभाषा प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। एतिस्तुशास्वृद्धजुषः क्यप् से क्यप् की अनुवृत्ति आती है। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।

मृज् धातु से क्यप् प्रत्यय विकल्प से होता है।

मृन्यः। मृज् से विकल्प से क्यप् होकर कित् होने के कारण लघूपधगुण नहीं हुआ- मृन्यः। क्यप् न होने के पक्ष में ऋहलोण्यत् से ण्यत् होकर मृजेर्वृद्धिः से वृद्धि और चजोः कु घिण्ण्यतोः से जकार को कुत्व होकर मार्ग्यः बनता है।