Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 33
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VṛttiGovind
LSK 778
इदादेशविधायकं विधिसूत्रम्
शास इदङ्हलोः
Aṣṭādhyāyī 6.4.34
Vṛtti Varadarājācārya

शास उपधाया इत्स्यादङ् हलादौ क्ङिति।

शिष्यः। वृत्यः। आदृत्यः। जुष्यः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७७८- शास इदङ्हलोः। अङ् च हल् च अङ्हलौ, तयोरङ्हलोः। शासः षष्ठ्यन्तम्, इत् प्रथमान्तम्, अङ्हलोः सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। अनिदितां हल उपधाया क्ङिति से उपधायाः और क्ङिति की अनुवृत्ति आती है और अङ्गस्य का अधिकार है।

अङ् या हलादि कित् और ङित् परे हो तो शास् धातु की उपधा के स्थान पर ह्रस्व इकार आदेश होता है।

शिष्यः। (शासु अनुशिष्टौ) शास् धातु से एतिस्तुशास्वृद्वजुषः क्यप् से क्यप् हुआ। शास्+य में शास इदङ्हलोः से शास् के आकार को इकार आदेश हुआ और इकार से परे सकार को शासिवसिघसीनां च से षत्व होकर शिष्य बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुविभक्ति, रुत्वविसर्ग होकर शिष्यः सिद्ध हुआ।

आगे क्यप् और तुक् करके वृ से वृत्यः, आ+दृ से आदृत्यः बनते हैं। जुष् से केवल क्यप् होकर जुष्यः बनता है।