Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 33
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VṛttiGovind
LSK 777
तुगागमविधायकं विधिसूत्रम्
ह्रस्वस्य पिति कृति तुक्
Aṣṭādhyāyī 6.1.71
Vṛtti Varadarājācārya

इत्यः। स्तुत्यः। शासु अनुशिष्टौ।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७७७- ह्रस्वस्य पिति कृति तुक्। ह्रस्वस्य षष्ठ्यन्तं, पिति सप्तम्यन्तं, कृति सप्तम्यन्तं, तुक् प्रथमान्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। पिति कृति परे ह्रस्वस्य तुगागमो भवति।

पित् कृत् के परे होने पर ह्रस्व वर्ण को तुक् का आगम होता है।

तुक् में उकार और ककार की इत्संज्ञा होती है। त् बचता है। कित् होने के कारण आद्यन्तौ टकितौ के नियम से अन्तावयव होकर तकार बैठेगा।

इत्यः। इण् गतौ। गत्यर्थक इ धातु से अचो यत् से यत् प्रत्यय की प्राप्ति थी, उसे बाधकर एतिस्तुशास्वृद्वजुषः क्यप् से क्यप् हुआ, अनुबन्धलोप हुआ, इ+य में ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् से तुक् आगम हुआ, अनुबन्धलोप होकर कित् होने के कारण ह्रस्व वर्ण इ के अन्तावयव होकर के बैठा, इत्य बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, रुत्वविसर्ग करके इत्यः बना। यदि यत् होता तो तुक् न हो पाता और गुण होकर अय् आदेश होकर अय्यः ऐसा अनिष्ट रूप बनने लगता।

स्तुत्यः। ष्टुञ्, स्तु धातु से भी इसी तरह क्यप्, तुक्, सु, रुत्वविसर्ग करके स्तुत्यः बनाइये।