Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 33
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VṛttiGovind
LSK 776
क्यप्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
एतिस्तुशास्वृदृजुषः क्यप्
Aṣṭādhyāyī 3.1.109
Vṛtti Varadarājācārya

एभ्यः क्यप् स्यात्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

इण्, स्तु, शास्, वृ, दृ और जुष् इन धातुओं से क्यप् प्रत्यय होता है।

क्यप् में ककार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा और पकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा और दोनों का तस्य लोपः से लोप होकर केवल य बचता है। पित् करने का फल

ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् से तुक् का आगम है और कित् करने का फल क्ङिति च से गुण का निषेध करना है।