Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 33
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VṛttiGovind
LSK 774
ईदादेशविधायकं विधिसूत्रम्
ईद्यति
Aṣṭādhyāyī 6.4.65
Vṛtti Varadarājācārya

यति परे आत ईत्स्यात्। देयम्। ग्लेयम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७७४- ईद्यति। ईत् प्रथमान्तं, यति सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में आतो लोप इटि च से आतः की अनुवृत्ति आती है।

यत्-प्रत्यय के परे होने पर धातु के अन्त में विद्यमान आकार के स्थान पर ईकार आदेश होता है।

देयम्। दान देने के अर्थ में दा धातु है, उससे अचो यत् से यत् प्रत्यय हुआ, तकार की इत्संज्ञा और लोप करके दा+य बना। ईद्यति से दा के आकार के स्थान पर ईकार आदेश हुआ, दी+य बना। य को आर्धधातुक मानकर दी में ईकार को सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण, देय बना। देय की प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अमादेश, पूर्वरूप करके देयम् बना। देयम्- देने योग्य।

पेयम्। पीने के अर्थ में पा-धातु है, उससे देयम् की तरह पेयम् बनाइये। इसी प्रकार से ज्ञा से ज्ञेयम्, मा से मेयम्, स्था से स्थेयम्, गा से गेयम्, ध्या से ध्येयम्, घ्रा से घ्रेयम्, धा से धेयम्, हा से हेयम् भी बना सकते हैं।