Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 33
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VṛttiGovind
LSK 773
यत्प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
अचो यत्
Aṣṭādhyāyī 3.1.97
Vṛtti Varadarājācārya

अजन्ताद्धातोर्यत् स्यात्। चेयम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७७३- अचो यत्। अचः पञ्चम्यन्तं, यत् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में धातोः, प्रत्ययः, परश्च इन तीनों सूत्रों का अधिकार है।

अच् प्रत्याहार के वर्ण आदि में हों ऐसे धातुओं से यत् प्रत्यय होता है।

तकार की इत्संज्ञा होती है और य ही बचता है। यह भी कृत् और कृत्य दोनों ही है तथा भाव और कर्म अर्थ में ही हुआ है।

चेयम्। संग्रह करना, चयन करना अर्थ वाला चि धातु है। उससे अचो यत् से यत् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप होकर चि+य बना। य की आर्धधातुकसंज्ञा और चि के इकार की सार्वधातुकसंज्ञा, गुण करके चेय बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अम्, पूर्वरूप करके चेयम् सिद्ध हुआ। चेयम्=संग्रह करने योग्य।

जेयम्। जीतना अर्थ वाला जि धातु है। उससे अचो यत् से यत् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप होकर जि+य बना। य की आर्धधातुकसंज्ञा और जि के इकार को सार्वधातुक गुण करके चेय बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अम्, पूर्वरूप करके जेयम् सिद्ध हुआ। जेयम्=जीतने योग्य। अब इसी प्रकार निम्नलिखित धातुओं से निम्नानुसार रूप बनाइये।

नी-नेयम् (ले जाने योग्य)। क्षि-क्षेयम् (क्षीण होने योग्य) आ+श्रि-आश्रेयम् (आश्रय लेने योग्य) श्रु-श्रव्यम्, गुण होकर ओकार और वान्तो यि प्रत्यये से अव् आदेश। (सुनने योग्य)।