Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 33
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VṛttiGovind
LSK 772
कृत्यल्युट्प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
कृत्यल्युटो बहुलम्
Aṣṭādhyāyī 3.3.113
Vṛtti Varadarājācārya

क्वचित्प्रवृत्तिः क्वचिदप्रवृत्तिः क्वचिद्विभाषा क्वचिदन्यदेव।

विधेर्विधानं बहुधा समीक्ष्य चतुर्विधं बाहुलकं वदन्ति॥

स्नात्यनेनेति स्नानीयं चूर्णम्। दीयतेऽस्मै दानीयो विप्रः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७७२- कृत्यल्युटो बहुलम्। कृत्यल्युटः प्रथमान्तं, बहुलं प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। कृत्यसंज्ञकाः प्रत्यया ल्युट् च बहुलेन भवन्ति

कृत्यसंज्ञक प्रत्यय और ल्युट् प्रत्यय बहुल से होते हैं।

बहुल का अर्थ अधिकतर नहीं है। यह पारिभाषिक शब्द है। इसकी परिभाषा बताने के लिए वैयाकरणजगत् में क्वचित्प्रवृत्तिः यह श्लोक प्रसिद्ध है। बहुल के चार अर्थ हैं- पहला- क्वचित्प्रवृत्तिः- ऐसा सूत्र जहाँ लगना चाहिए वहाँ तो लगता ही है और जहाँ लगने की योग्यता नहीं है, वहाँ भी लग जाता है। दूसरा- क्वचित् अप्रवृत्तिः- कहीं-कहीं लगने योग्य स्थानों पर भी नहीं लगता। तीसरा- क्वचिद्विभाषा- कहीं-कहीं विकल्प से होता है और चौथा- क्वचिद् अन्यद् एव- कहीं कुछ और ही भी होता है। और ही होता है का तात्पर्य यह है कि

निर्धारित अर्थ, निर्धारित योग्यता के अतिरिक्त भी कुछ और ही विधान होता है। जैसे- स्नानीयम्। स्नान्ति अनेन (इसके द्वारा स्नान करते हैं, उबटन चूर्ण) इस विग्रह में अनेन में तृतीया है, वह करण अर्थ में है। कृत्य प्रत्यय तो भाव या कर्म अर्थ में होना चाहिए किन्तु बहुल होने के कारण क्वचिदन्यदेव अर्थात् कुछ और ही हुआ। तात्पर्य करण अर्थ में कृत्य-प्रत्यय का विधान कर दिया। इसी प्रकार दानीयः में दीयते अस्मै (जिसे दान दिया जाय) में सम्प्रदान अर्थ (चतुर्थी) में कृत्य-प्रत्यय का विधान कर दिया। यही क्वचिदन्यदेव है। इसी प्रकार से ल्युट् प्रत्यय के सम्बन्ध में समझना चाहिए। स्नानीयम् में स्ना धातु से अनीयर्, स्ना+अनीय, सवर्णदीर्घ करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अम्, पूर्वरूप करके स्नानीयम् बना। चूर्ण नपुंसक लिङ्ग और एकवचनान्त होने के कारण यह भी नपुंसक लिङ्गी और एकवचनान्त हुआ।

दानीयः। दीयते अस्मै इस विग्रह में कृत्यल्युटो बहुलम् से बहुल से कृत्य-प्रत्यय अर्थात् अनीयर् प्रत्यय हुआ, दा+अनीय बना। सवर्णदीर्घ करके दानीय बना। सु, रुत्वविसर्ग हुआ, दानीयः। विप्रः पुँल्लिङ्ग और एकवचन का होने के कारण दानीयः भी पुँल्लिङ्ग और एकवचन का ही हुआ।