Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 33
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VṛttiGovind
LSK 771
तव्यतादिप्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
तव्यत्तव्यानीयरः
Aṣṭādhyāyī 3.1.96
Vṛtti Varadarājācārya

धातोरेते प्रत्ययाः स्युः। एधितव्यम्, एधनीयं त्वया।

भावे औत्सर्गिकमेकवचनं क्लीबत्वं च। चेतव्यश्चयनीयो वा धर्मस्त्वया।

वार्तिकम्- केलिमर उपसंख्यानम्। पचेलिमा माषाः। पक्तव्या इत्यर्थः। भिदेलिमाः

सरलाः। भेतव्या इत्यर्थः। कर्मणि प्रत्ययः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७७१- तव्यत्तव्यानीयरः। तव्यच्च तव्यश्च अनीयर् च, तेषामिरतरेतरद्वन्द्वस्तव्यत्तव्यानीयरः। तव्यत्तव्यानीयरः प्रथमान्तम् एकपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च और धातोः इन सूत्रों का अधिकार है।

धातु से तव्यत्, तव्य और अनीयर् प्रत्यय होते हैं।

तव्यत् में तकार की इत्संज्ञा होती है और लोप होकर तव्य ही शेष रहता है। एक तव्य तित् है और एक नहीं। तित् करने का फल तित्स्वरितम् से स्वरितस्वर का विधान है। अनियर् में रेफ इत्संज्ञक है। कृत्-प्रत्यय यदि शित् हैं तो उनकी तिङ्शित्सार्वधातुकम् से सार्वधातुकसंज्ञा होती है और शित् से भिन्न हों तो उनकी आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा होती है। ये तीनों प्रत्यय शित् नहीं हैं, अतः इनकी आर्धधातुकसंज्ञा ही होगी। आर्धधातुक प्रत्यय वलादि हो और धातु अनिट् न हो तो उस वलादि प्रत्यय को आर्धधातुकस्येङ् वलादेः से इट् का आगम भी होगा।

तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः के नियम से तव्यत्, तव्य और अनीयर् ये अकर्मक धातु से भाव और कर्म अर्थ में हुए हैं। भाव अर्थ में स्वाभाविक रूप से नपुंसकलिङ्ग और एकवचन ही होता है। धातु के अर्थ क्रिया मात्र को भाव कहते हैं। भाव न तो स्त्रीलिङ्ग होता है और न ही पुँल्लिङ्ग, अतः स्वाभाविक रूप से नपुंसकलिङ्ग ही होगा। जिस क्रिया में कृत्य प्रत्यय लगा होता है, उसका कर्ता अनुक्त होने के कारण तृतीया विभक्ति वाला हो जाता है।

एधितव्यम्। अकर्मक एध वृद्धौ धातु को आपने भ्वादिप्रकरण में पढ़ा था। अनुबन्धलोप होकर एध् बचा है। उससे तव्यत्तव्यानीयरः से भाव अर्थ में तव्यत् या तव्य प्रत्यय हुए। तव्यत् होने के पक्ष में तकार की इत्संज्ञा होकर लोप हुआ, तव्य बचा। एध्+तव्य बना। तव्य की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा हुई और धातु अनिट् नहीं है, अतः आर्धधातुकस्येङ् वलादेः से इट् का आगम हुआ। टकार की इत्संज्ञा और लोप, टित् होने के कारण तव्य के आदि में बैठा, एध्+इ+तव्य बना। वर्णसम्मेलन हुआ- एधितव्य बना। तव्य कृत् प्रत्यय है, अतः कृदन्त शब्द हुआ। कृदन्त होने के कारण इसकी कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सु विभक्ति आई। नपुंसक होने के कारण सु के स्थान पर

अतोऽम् से अम् आदेश और अमि पूर्वः से पूर्वरूप होकर ज्ञानम् की तरह एधितव्यम् बना। भाव अर्थ में प्रत्यय होने के कारण नपुंसकलिङ्ग तथा एकवचन ही होगा। यह एक क्रिया का ही रूप हुआ। एध् धातु का वृद्धि अर्थ होने से तो एधितव्यम् का अर्थ बढ़ना चाहिए ऐसा हुआ। इसका कर्ता अनुक्त होने से हमेशा तृतीयान्त ही होगा। कर्ता प्रथमपुरुष वाला, मध्यमपुरुष वाला या उत्तमपुरुष वाला कोई भी हो सकता है और एकवचन, द्विवचन या बहुवचन किसी भी वचन का हो सकता है किन्तु क्रियापद एकवचन और नपुंसकलिङ्ग वाला एधितव्यम् ही रहेगा। जैसे- तेन एधितव्यम्, ताभ्याम् एधितव्यम्, तैः एधितव्यम्। त्वया एधितव्यम्, युवाभ्याम् एधितव्यम्, युष्माभिः एधितव्यम्, मया एधितव्यम्, आवाभ्याम् एधितव्यम्, अस्माभिः एधितव्यम्। इसी प्रकार से सभी भावार्थक कृत्यप्रत्ययों के विषय में समझना चाहिए।

एधनीयम्। एध् धातु से तव्यत्तव्यानीयरः से अनीयर् प्रत्यय हुआ। एध्+अनीयर् हुआ। रकार का लोप करके एध्+अनीय बना। अनीय की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा हुई किन्तु अनीय वलादि नहीं है, अतः आर्धधातुकस्येद् वलादेः से इट् का आगम नहीं हुआ। एध्+अनीय में वर्णसम्मेलन हुआ- एधनीय बना। अनीय कृत् प्रत्यय है, अतः कृदन्त के कारण इसकी कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सु विभक्ति आई। नपुंसक होने के कारण सु के स्थान पर अतोऽम् से अम् आदेश और अमि पूर्वः से पूर्वरूप होकर ज्ञानम् की तरह एधनीयम् बना। भाव में प्रत्यय होने के कारण नपुंसक और एकवचन मात्र होगा। यह भी एक क्रिया का ही रूप हुआ। एध् धातु के वृद्धि अर्थ होने से एधनीयम् का अर्थ बढ़ना चाहिए हुआ। इसका भी कर्ता अनुक्त होने के कारण तृतीयान्त ही होगा। कर्ता प्रथमपुरुष वाला, मध्यमपुरुष वाला या उत्तमपुरुष वाला कोई भी हो सकता है और एकवचन, द्विवचन या बहुवचन कोई भी हो सकता है किन्तु क्रियापद एधितव्यम् एकवचन और नपुंसकलिङ्ग ही रहेगा।

चेतव्यः, चयनीयः। सकर्मक चिञ् (चयने) धातु का संग्रह करना अर्थ है। जकार इत्संज्ञक है, उससे तव्य हुआ, चि+तव्य बना। तव्य की आर्धधातुकसंज्ञा और चि के इकार को सार्वधातुकार्थकयोः से गुण होकर चे बन गया, चेतव्य की प्रातिपदिकसंज्ञा, सु विभक्ति, अनुबन्धलोप और रुत्वविसर्ग करने पर चेतव्यः सिद्ध हुआ। इसी प्रकार अनीयर् करने पर चि+अनीय में चि को गुण चे, अय् आदेश करने पर च्+अय्+अनीय बना। वर्णसम्मेलन होकर चयनीय बना, उसकी प्रातिपदिकसंज्ञा और सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करने पर चयनीयः बना। यहाँ पर कर्म अर्थ में प्रत्यय हुआ है। अतः चेतव्यः आदि कर्म के विशेषण होते हैं अर्थात् कर्म जिस लिङ्ग, जिस विभक्ति और जिस वचन में है, ये भी वैसे ही होते हैं। इस लिए इस त्वया धर्मः चेतव्यः में धर्मशब्द कर्मसंज्ञक है और वह पुँल्लिङ्गी प्रथमा एकवचनान्त है। अतः चेतव्यः और चयनीयः भी पुँल्लिङ्ग प्रथमा एकवचनान्त बन गये। भाव अर्थ में प्रत्यय होगा तो नपुंसकलिङ्ग और एकवचन ही होगा तथा कर्म अर्थ में प्रत्यय होगा तो कर्म जिस लिङ्ग, विभक्ति और वचन का होगा कृत्यप्रत्ययान्त क्रियापद भी उसी लिङ्ग, विभक्ति और वचन का ही होगा। जैसे- तेन पुष्पं चेतव्यम्, ताभ्यां पुष्पं चेतव्यम्. तैः पुष्पं चेतव्यम्, तेन पुष्पे चेतव्ये, तेन पुष्पाणि चेतव्यानि, मया पुष्पाणि चेतव्यानि, मया लेखः पठितव्यः, युष्माभिः लेखः पठितव्यः, त्वया लेखाः पठितव्याः, सर्वैः पत्रे पठितव्ये आदि।

कृदन्त होने के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा होती है और सु आदि सभी विभक्तियाँ आती हैं। अतः कर्म अर्थ में प्रत्यय होने पर सातों विभक्तियों के तीनों वचनों में रूप बनते हैं।

जैसे- चेतव्यः, चेतव्यौ, चेतव्याः। चेतव्यम्, चेतव्यौ, चेतव्यान्। चेतव्येन, चेतव्याभ्याम्, चेतव्यैः। चेतव्याय, चेतव्याभ्याम्, चेतव्येभ्यः। चेतव्यात्, चेतव्याभ्याम्, चेतव्येभ्यः। चेतव्यस्य, चेतव्ययोः, चेतव्यानाम्। चेतव्ये, चेतव्ययोः, चेतव्येषु। हे चेतव्य!, हे चेतव्यौ! हे चेतव्याः! इसी प्रकार चेतव्यो धर्मः, चेतव्यौ धर्मौ, चेतव्याः धर्माः आदि।

केलिमर उपसंख्यानम्। यह वार्तिक है। धातुओं से केलिमर् प्रत्यय भी होता है। अर्थात् तव्यत्तव्यानीयरः इस सूत्र में केलिमर् प्रत्यय भी जोड़ देना चाहिए। यह प्रत्यय भी सभी धातुओं से हो सकता है। भाष्यकार ने इस प्रत्यय को कर्म अर्थ में माना है। केलिमर् में ककार की लशक्वतद्धिते से और रकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होकर एलिम शेष रहता है। कित् होने के कारण गुणनिषेध हो जाता है।

पचेलिमा माषाः, पक्तव्या इत्यर्थः। (पकाने योग्य ऊड़द) पच्( डुपचष् पाके ) धातु से केलिमर उपसंख्यानम् इस वार्तिक से केलिमर् प्रत्यय होकर अनुबन्धलोप होने पर पच्+एलिम बना। आगे माषाः यह विशेष्यपद है और उसमें पुँल्लिङ्ग, प्रथमा का बहुवचन है, अतः विशेषण पचेलिम शब्द से भी पुँल्लिङ्ग में प्रथमा का बहुवचन जस् विभक्ति आई और रामाः की तरह पचेलिमाः बन गया। पचेलिमास्+माषाः में सकार को रुत्व, रेफ को यत्व और यकार का लोप आदि कार्य होकर पचेलिमा माषा बन जाता है।

भिदेलिमाः सरलाः, भेत्तव्या इत्यर्थः। (सरल, सीधे (पेड़ आदि) काटने योग्य हैं) भिद् ( भिदिर् द्वैधीकरणे ) धातु से केलिमर् प्रत्यय करके अनुबन्धलोप करने पर भिद्+एलिम बना। पुगन्तलघूपधस्य च से प्राप्त गुण का कित् होने के कारण विङ्ति च से निषेध हुआ। वर्णसम्मेलन होकर भिदेलिम बना। सरलाः इस विशेष्यपद के कारण इसमें भी पुँल्लिङ्ग में प्रथमा का बहुवचन आकर भिदेलिमाः सिद्ध हुआ।