Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 33
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VṛttiGovind
LSK 768
कृत्यसंज्ञाविधायकं संज्ञासूत्रम्
कृत्याः
Aṣṭādhyāyī 3.1.95
Vṛtti Varadarājācārya

ण्वुल्तृचावित्यतः प्राक् कृत्यसंज्ञाः स्युः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७६८- कृत्याः। कृत्याः प्रथमान्तम् एकपदमिदं सूत्रम्।

ण्वुल्तृचौ से पहले जितने प्रत्यय कहे गये हैं, वे कृत्यसंज्ञक होते हैं।

यह सूत्र कृत्यसंज्ञा का अधिकार करता है इसलिए संज्ञासूत्र मानने में भी कोई आपत्ति नहीं है। इसका अधिकार ण्वुल्तृचौ के पहले तक जाता है। उससे पहले के प्रत्ययों की कृत्संज्ञा तो होती है और कृत्यसंज्ञा भी होती है। यहाँ एक संज्ञा का अधिकार न होने से संज्ञाद्वय का समावेश है। कृत्यप्रत्यय सात होते हैं-

तव्यं च तव्यतञ्चैवानीयर्केलिमरौ तथा।

यतं ण्यतं क्यपं चापि कृत्यान् सप्त प्रचक्षते॥

अर्थात् तव्यत्, तव्य, अनीयर्, केलिमर्, यत्, ण्यत् और क्यप् ये सात प्रत्यय कृत्य माने गये हैं।