Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 33
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VṛttiGovind
LSK 767
परिभाषासूत्रम्
वाऽसरूपोऽस्त्रियाम्
Aṣṭādhyāyī 3.1.94
Vṛtti Varadarājācārya

अस्मिन् धात्वधिकारेऽसरूपोऽपवादप्रत्यय उत्सर्गस्य बाधको वा स्यात्

स्त्र्यधिकारोक्तं विना।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७६७- वाऽसरूपोऽस्त्रियाम्। समानं रूपं यस्य स सरूपः, न सरूपः असरूपः। न स्त्री अस्त्री, तस्याम्, अस्त्रियाम्। वा अव्ययपदं, असरूपः प्रथमान्तम्, अस्त्रियां सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् से तत्र की अनुवृत्ति आती है और उत्सर्गस्य अपवादप्रत्ययो बाधकः स्यात् इन पदों का अध्याहार किया जाता है।

इस धातोः सूत्र के अधिकार में पढ़े गये असमानरूप अपवाद प्रत्यय उत्सर्ग के विकल्प से बाधक होते हैं किन्तु यह बात स्त्र्यधिकार के प्रत्ययों में लागू नहीं होती।

शास्त्र अर्थात् सूत्र दो प्रकार के होते हैं- उत्सर्ग और अपवाद। जो सामान्यरूप से कार्य का विधान करते हैं, उन्हें उत्सर्ग और जो विशेष रूप से कार्य करते हैं, उनको अपवाद शास्त्र कहा जाता है। कौमुदी के प्रारम्भ से अभी तक यह नियम चला आ रहा था कि विशेष शास्त्र उत्सर्ग शास्त्र का नित्य से बाधक होता है किन्तु यहाँ आकर यह परिवर्तन हुआ कि उत्सर्ग शास्त्र को अपवाद शास्त्र के द्वारा विकल्प से बाधा जाता है अर्थात् उत्सर्ग शास्त्र भी लगेगा और विशेष शास्त्र भी। तात्पर्य यह है कि उत्सर्ग-सूत्रों विहित सामान्य प्रत्यय भी होंगे और अपवाद सूत्रों से विशेष विधान करके किये जाने वाले प्रत्यय भी होंगे। इसमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उत्सर्ग और अपवाद प्रत्ययों में समानता अर्थात् समानरूप नहीं होना चाहिए। समानरूप होने पर तो उत्सर्ग को विशेष शास्त्र नित्य से ही बाधता है अर्थात् दोनों प्रत्ययों में समानरूप होने पर सामान्य प्रत्यय को बाधकर नित्य से विशेष प्रत्यय हो जाता है। सूत्र में अस्त्रियाम् पढ़ा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि यह विकल्प से बाध ने वाला नियम स्त्रियाम् सूत्र के अधिकार में होने वाले प्रत्ययों के सम्बन्ध में लागू नहीं होगा।

कुछ उदाहरण देखें- कृत्य, पूर्वकृदन्त और उत्तरकृदन्त में धातोः के अधिकार वाले प्रत्यय होंगे। इन प्रकरणों होने वाले प्रत्ययों में से तव्यत्तव्यानीयरः से होने वाले प्रत्यय तव्यत्, अनीयर् और अचो यत् से होने वाला प्रत्यय यत् तथा ण्वुल्तृचौ से होने वाले ण्वुल् और तृच् आदि हैं। अनुबन्धलोप होने पर क्रमशः तव्य, अनीय, य, वु और तृ बचते हैं। ये प्रत्यय परस्पर असमानरूप वाले हैं अर्थात् एक दूसरे से भिन्न रूप वाले हैं। अतः तव्यत् को विकल्प से बाधकर अनीयर् और यत् होते हैं। इसी तरह ण्वुल् प्रत्यय को बाधकर विकल्प से तृच् प्रत्यय हो जाता है। यह असमान प्रत्ययों का उदाहरण है।

समानरूप प्रत्ययों में तो नित्य से बाध्यबाधकभाव होता है। जैसे कि अचो यत् से होने वाला यत् और ऋहलोण्यत् से होने वाला ण्यत् प्रत्यय होता है। यत् में तकार की इत्संज्ञा होकर य बचता है और ण्यत् में भी णकार की चुटू से इत्संज्ञा और तकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होकर य ही बचता है। इस तरह दोनों प्रत्ययों में केवल य मात्र शेष बचता है। इस तरह दोनों रूपों में समानता है। इस पर प्रश्न यह हो सकता है कि यत् और ण्यत् में भले ही अनुबन्धलोप के बाद समानता है किन्तु अनुबन्धलोप के पहले तो असमान है ही। अतः समानता अनुबन्धरहित में देखना चाहिए कि अनुबन्धरहित में? इसके उत्तर में यह कहा जाता है- नानुबन्धकृतमसारूप्यम्। इस परिभाषा के अनुसार अनुबन्ध अर्थात् इत्संज्ञक वर्णों को मानकर असमानता नहीं माननी चाहिए। यत् और ण्यत् में अनुबन्धलोप करने के बाद य के रूप में समानता है, अर्थात् समानरूप प्रत्यय हो जाते हैं। अतः यत् इस सामान्य प्रत्यय को ण्यत् यह विशेष प्रत्यय नित्य से बाधता है अर्थात् बाधक ण्यत् तो हो जायेगा किन्तु बाध्य यत् नहीं होगा।

स्त्रियाम् के अधिकार में यह परिभाषा नहीं लगती। इसलिए स्त्रियां क्तिन् ३.३. ९४ इस उत्सर्ग का अ प्रत्ययात् ३.३.१०२ यह अपवाद नित्य से बाधक होता है। क्तिन् और अ प्रत्ययों में असमानता होने पर भी विकल्प से बाध्यबाधकभाव नहीं होता अपितु नित्य से ही अ प्रत्यय क्तिन् का बाधक होता है जिससे चिकीर्षा, जिहीर्षा ऐसे अप्रत्ययान्त ही रूप बनते हैं, न कि क्तिन्प्रत्ययान्त भी। अन्य उदाहरण यथास्थल स्पष्ट हो जायेंगे।