आतृतीयाध्यायसमाप्तेर्ये प्रत्ययास्ते धातोः परे स्युः। कृदतिङिति कृत्संज्ञा।
अब कृदन्तप्रकरण प्रारम्भ होता है। धातु से दो प्रकार के प्रत्यय होते हैं- तिङ् और कृत्। तिङ् तो प्रत्याहार है जो तिप् से लेकर महिङ् तक हैं और वे धातुओं से विहित लकारों के स्थान पर होते हैं। कृत्प्रत्यय वे हैं जिनकी कृदतिङ् से कृत्संज्ञा होती है, जिसमें अण्, अच्, णमुल्, अनीयर् आदि हैं। धातु से होने वाले प्रत्ययों में तिङ् प्रत्ययों को छोड़कर शेष सारे प्रत्यय कृत् कहलाते हैं। प्रातिपदिक (शब्द) बनाने के लिए सबसे पहले धातुओं से कृत् प्रत्यय किये जाते हैं। कृत् प्रत्यय लगने से वह कृदन्त बन जाता है और उसकी कृत्तिङ्गतसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो जाती है। कृदन्त के ज्ञान के विना व्याकरण का ज्ञान सम्भव ही नहीं है। कहीं-कहीं भाषा में तिङन्त-क्रिया के विना कृदन्त-क्रिया से ही सारा व्यवहार किया जाता है और संस्कृत साहित्य में कृदन्तों का प्रयोग बहुतायत होता है।
कृदन्त को चार भागों में बाँटा गया है- कृत्य, पूर्वकृदन्त, उणादि और उत्तरकृदन्त। कृत्-संज्ञा के अन्तर्गत कुछ प्रत्ययों की कृत्यसंज्ञा होती है, इसीलिए इस प्रथम प्रकरण को कृत्यप्रकरण कहा जाता है।
७६६- धातोः। धातोः पञ्चम्यन्तम् एकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में प्रत्ययः और परश्च का अधिकार आ रहा है।
तृतीयाध्याय के समाप्ति पर्यन्त जो प्रत्यय होते हैं, वे धातु से परे हों।
इस सूत्र से लेकर अर्थात् इस सूत्र की संख्या तृतीय अध्याय के प्रथम पाद के ११वें सूत्र से लेकर तृतीयाध्याय की समाप्ति पर्यन्त अर्थात् पाणिनीयाध्यायी के तृतीयाध्याय के चतुर्थपाद के अन्तिम सूत्र छन्दस्युभयथा तक जो भी प्रत्यय हों वे धातु के बाद ही हों, ऐसा अधिकार यह सूत्र करता है।
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स्मरण रहे कि कृदतिङ् (३०२) सूत्र द्वारा धातुओं से होने वाले तिङ्-भिन्न प्रत्ययों की कृत्संज्ञा होती है।