वा स्यात्। कृष्णं नमेच्चेत्सुखं यायात्। कृष्णं नंस्यति चेत्सुखं यास्यति।
भविष्यत्येवेष्यते। नेह। हन्तीति पलायते।
विधिनिमन्त्रणेति लिङ्। विधिः प्रेरणं भृत्यादेर्निकृष्टस्य प्रवर्तनम्। यजेत।
निमन्त्रणं नियोगकरणम्। आवश्यके श्राद्धभोजनादौ दौहित्रादेः प्रवर्तनम्।
इह भुञ्जीत। आमन्त्रणं कामचारानुज्ञा। इहासीत।
अधीष्टं सत्कारपूर्वको व्यापारः। पुत्रमध्यापयेद्भवान्।
सम्प्रश्नः सम्प्रसारणम्। किं भो वेदमधीयीय उत तर्कम्।
प्रार्थनं याञ्ना। भो भोजनं लभेय। एवं लोट्।
इति लकारार्थप्रक्रिया॥३२॥
इति तिङन्तम्।
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७६५- हेतुहेतुमतोर्लिङ्। हेतुरस्यास्तीति हेतुमान्। हेतुश्च हेतुमान् च तयोरितरेतरद्वन्द्वो हेतुहेतुमन्तौ, तयोर्हेतुमतोः। विभाषा धातौ सम्भावन० से विभाषा की अनुवृत्ति आती है।
हेतु और हेतुमान् अर्थात् कार्यकारण-भाव अर्थ क्रिया से प्रकट हो तो धातु से लिङ् लकार होता है।
हेतु और हेतुमान् भाव का तात्पर्य कार्यकारणभाव ही समझना चाहिए। जैसे ईटे होते तो मकान बन जाता। परिश्रम से पढ़े होते तो परीक्षा में उत्तीर्ण होते। इन वाक्यों में यह दीखता है कि यदि कारण हुआ होता तो कार्य भी हो गया होता, हेतु विद्यमान रहता तो हेतुमान् अर्थात् उससे होने वाला कार्य भी सिद्ध हो गया होता आदि। अब इन वाक्यों से यह भी स्पष्ट होता है कि कार्य अभी नहीं हुआ है अर्थात् क्रिया कि सिद्धि नहीं हुई है। इसमें भविष्यत्काल होना चाहिए। जैसे अच्छी वृष्टि अर्थात् वर्षा होगी तो अनाज भी अच्छा होगा। हेतु-हेतुमद्भाव तो भूतकाल और वर्तमान काल में भी होते हैं किन्तु इस सूत्र की प्रवृत्ति में हेतु-हेतुमद्भाव के होते हुए भविष्यत्काल का होना आवश्यक है क्योंकि इस सूत्र में भविष्यत्येव यह वार्तिक पठित है।
कृष्णं नमेच्चेत्सुखं यायात्। कृष्णं नंस्यति चेत्सुखं यास्यति। यदि कृष्ण को नमस्कार करोगे तो सुख प्राप्त करोगे। यहाँ पर सुख प्राप्ति रूप कार्य के लिए कृष्ण का नमन रूप कारण बताया जा रहा है। अतः हेतु नम् धातु और हेतुमान् या धातु दोनों से लिङ् लकार का प्रयोग होकर नमेत् और यायात् बने। यहाँ पर क्रमशः नम् और या धातु के लिङ् का रूप है। यह कार्य वैकल्पिक है। अतः एक पक्ष में लृट् भी होता है- कृष्णं नंस्यति चेत्सुखं यास्यति।
भविष्यत्येवेष्यते। नेह। हन्तीति पलायते। हेतुहेतुमतोर्लिङ् में भविष्यति अर्थात् भविष्यत् काल में ही, इतना अर्थ जोड़ना चाहिए। फलतः हन्तीति पलायते में हेतुहेतुमद्भाव अर्थात् कार्यकारणभाव के होते हुए भी लिङ् नहीं होगा। जैसे हन्तीति पलायते वह मारता है, इस लिए दूर भागता है। यहाँ पर कार्यकारणभाव है फिर भी भविष्यत्काल न होने से लिङ् न होकर लृट् ही हुआ।
विधिनिमन्त्रणाधीष्टसम्प्रश्नप्रार्थनेषु लिङ्। यह सूत्र भ्वादि में पढ़ा जा चुका है। यह विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट, सम्प्रश्न, प्रार्थना इन अर्थों में और आशीर्वाद अर्थ में धातु से लिङ् लकार का विधान करता है। इस सूत्र के विधान में काल अर्थात् समय से कोई मतलब नहीं है।
विधिः प्रेरणं भृत्यादेर्निकृष्टस्य प्रवर्तनम्। यजेत। अपने से छोटे अर्थात् पुत्र, भाई, सेवक आदि को आज्ञा देना विधि कहलाता है। जैसे- तुम पुस्तक दो, बेटे! घर जाओ आदि।
यजेत। यज्ञ करना चाहिए। यह विधि अर्थ है, अतः विधिनिमन्त्रणाधीष्ट-सम्प्रश्न-प्रार्थनेषु लिङ् से लिङ् लकार होकर यजेत बना।
निमन्त्रणं नियोगकरणम्। आवश्यके श्राद्धभोजनादौ दौहित्रादेः प्रवर्तनम्। अवश्य-कर्तव्य में प्रेरणा देने को निमन्त्रण कहते हैं। जैसे- श्राद्ध आदि में दौहित्र अर्थात् अपनी लड़की के लड़के का भोजन अनिवार्य होता है तो वहाँ यह अनिवार्यरूप से भोजनार्थ आना ही है इस प्रकार से प्रेरणा देना ही निमन्त्रण है। इह भुञ्जीत। भुज् धातु के लिङ् का रूप है- भुञ्जीत।
आमन्त्रणं कामचारानुज्ञा। ऐसी प्रेरणा का नाम आमन्त्रण है कि जिसमें प्रेरक तो प्रेरणा देगा किन्तु जिसे प्रेरणा दी जाती है वह उस कार्य को करे या न करे, स्वतन्त्र होता है अर्थात् कामचारिता, अपनी इच्छा पर निर्भर होती है। जैसे- आप सभी विवाह की पार्टी में आमन्त्रित हैं इस वाक्य से यह स्पष्ट होता है कि पार्टी में जाने की प्रेरणा मिल रही है
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किन्तु हमें अपनी व्यवस्था के अनुसार जाना है। यदि अवकाश है तो जा सकते हैं, नहीं तो न जाने पर भी कोई आपत्ति नहीं है। दूसरा उदाहरण है- इह आसीत। यहाँ पर बैठ सकते हो। बैठने वाले की इच्छा और समय हो तो बैठेगा, नहीं तो नहीं भी बैठ सकता है। आस धातु से लिङ् का रूप है- आसीत।
अधीष्टं सत्कारपूर्वको व्यापारः। पुत्रमध्यापयेद्भवान्। किसी बड़े गुरु आदि को सत्कारपूर्वक किसी कार्य को करने की प्रेरणा देना अधीष्ट है। जैसे किसी आचार्य से कहा जाय कि- आप मेरे पुत्र को पढ़ायें। अध्यापयेत् यह अधि पूर्वक इङ् धातु के लिङ् का रूप है।
सम्प्रश्नं सम्प्रसारणम्। किं भो वेदमधीयीय उत तर्कम्। किसी बड़े के समीप एक निश्चयार्थ प्रश्न करना सम्प्रश्न कहलाता है। जैसे- गुरु जी! या पिता जी! मैं वेद पढ़ूँ या न्यायशास्त्र? यहाँ पर अधीयीय यह लिङ् लकार का रूप है।
प्रार्थनं याच्ञा। भो भोजनं लभेय। मांगने का नाम प्रार्थन (प्रार्थना) है। जैसे- मैं भोजन चाहता हूँ।
इसी तरह लोट् सूत्र से इन्हीं अर्थों में लोट् लकार भी होता है।
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या की
लकारार्थ-प्रक्रिया पूरी हुई।
अथ कृदन्ते कृत्यप्रकरणम्