लिटोऽपवादः। यजति स्म युधिष्ठिरः।
७६३- लट् स्मे। लट् प्रथमान्तं, स्मे सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अनद्यतने लड् से अनद्यतने और परोक्षे लिट् से परोक्षे की अनुवृत्ति आती है।
स्म शब्द उपपद में हो तो भूतानद्यतन परोक्ष अर्थ में धातु से परे लट् लकार होता है।
परोक्षे लिट् से भूत, अनद्यतन, परोक्ष में लिट् लकार की प्राप्ति थी, उसे बाधकर यह लगता है। इस सूत्र के बाद अपरोक्षे च भी पढ़ा गया है। उसका अर्थ है- अपरोक्ष भूत अनद्यतन में धातु से लट् लकार होता है, यदि स्म शब्द उपपद हो तो। इस तरह से स्म के योग होने पर परोक्ष और अपरोक्ष दोनों अर्थों में लट् लकार का विधान है।
यजति स्म युधिष्ठिरः। युधिष्ठिर यज्ञ करते थे। यहाँ भूत, अनद्यतन और परोक्ष अर्थ है फिर भी स्म उपपद के रहते लट् स्मे से लट् का विधान हुआ। अतः यजति स्म युधिष्ठिरः बन गया है। स्म के न रहने पर इयाज युधिष्ठिरः बनता है। जब अपरोक्षे च से अपरोक्ष भूत अर्थ में भी स्म के योग में लट् का विधान होता है तो एवं स्म पिता ब्रवीति पिता जी ऐसा कहते थे, आदि वाक्यों में भी लट् का प्रयोग हो सकता है।