Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 32
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VṛttiGovind
LSK 762
लृट्-लकारनिषेधकं विधिसूत्रम्
न यदि
Aṣṭādhyāyī 3.2.113
Vṛtti Varadarājācārya

यद्योगे उक्तं न। अभिज्ञानासि कृष्ण यद्वने अभुञ्जमहि।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७६२- न यदि। न अव्ययपदं, यदि सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अभिज्ञावचने लट् यह पूरा सूत्र अनुवृत्त होता है साथ ही भूते, अनद्यतने, धातोः का अधिकार है।

यद् शब्द के योग में स्मृतिबोधक पद के समीप रहने पर भी भूतानद्यतन अर्थ में लट् नहीं होता।

यह सूत्र पूर्वसूत्र का अपवाद है। इस सूत्र से स्मृतिबोधक पद के रहते हुए भी यदि उस वाक्य में यत् शब्द का प्रयोग हुआ है तो लट् न होकर लड् ही होता है।

अभिजानासि कृष्ण! यद् वने अभुञ्न्महि। कृष्ण! क्या तुम्हें याद है कि हम लोग वन में खाते थे। यहाँ पर स्मृतिबोधक पद अभिजानासि है। इसके योग में भुज् से भूतानद्यतन काल में अभिज्ञावचने लट् से लट् लकार प्राप्त था, तो यत् के योग में न यदि से उसका निषेध हुआ। अतः लड् लकार ही हो गया- अभुञ्न्महि। भुज् लड्, अडागम, महि, शनम्, अलोप, अनुस्वार, परसवर्ण होकर यह रूप सिद्ध होता है।