स्मृतिबोधिन्युपपदे भूतानद्यतने धातोर्लृट्। लङ्गोऽपवादः। वस निवासे।
स्मरसि कृष्ण गोकुले वत्स्यामः। एवं बुध्यसे, चेतयसे इत्यादिप्रयोगेऽपि।
अब लकारार्थप्रक्रिया का प्रारम्भ होता है। आपको ज्ञात है कि लृट् आदि लकार दस हैं। किन-किन अर्थों में कौन-कौन से लकार हों, इसके सम्बन्ध में भ्वादि में दस लकारों के लिए वर्तमाने लृट्, परोक्षे लृट् आदि से निर्णय दे दिया गया है किन्तु इतना मात्र पूर्ण नहीं है। ये सामान्य अर्थ हैं, अब उनके उत्सर्गापवादरूप अन्य अर्थों का निर्णय करने के लिए इस प्रकरण का आरम्भ किया गया है। इसके लिए लघुसिद्धान्तकौमुदी में केवल चार सूत्र बताये गये हैं, विशेष ज्ञान की अपेक्षा होने पर अष्टाध्यायी या वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी का अध्ययन करना चाहिए।
७६१- अभिज्ञावचने लृट्। अभिज्ञा स्मृतिः, सा उच्यतेऽनेति अभिज्ञावचनम्, तस्मिन्। अभिज्ञावचने सप्तम्यन्तं, लृट् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। भूते का अधिकार आ रहा है और अनद्यतने लङ् से अनद्यतने की अनुवृत्ति आती है।
स्मृतिबोधक पद समीप में हो तो भूत अनद्यतन काल में धातु से लृट् लकार होता है।
भूत अनद्यतन में अनद्यतने लङ् से लङ् लकार का विधान हुआ है किन्तु स्मृतिबोधक पद के समीप में विद्यमान रहने पर अनद्यतन भूत में लृट् लकार होता है।
स्मरसि कृष्ण! गोकुले वत्स्यामः। याद है कृष्ण! हम लोग गोकुल में रहते थे। यहाँ पर स्मृतिबोधकपद है- स्मरसि। अतः इसके योग में भूतानद्यतन काल में मी अनद्यतने लङ् अभिज्ञावचने लृट् से लृट् लकार होकर वत्स्यामः बनता है। यहाँ वस निवासे धातु है। उससे लृट्, मध्यमपुरुष के बहुवचन में वस् होकर स्यतासी लृलुटोः से स्य, अनिद् धातु होने से इट् के निषेध होने पर धातु के सकार को सः स्यार्धधातुके से तकार
आदेश होकर वत्स्यामः बनता है। इसी तरह बुध्यसे, चेतयसे अभिजानासि आदि स्मृतिबोधक पदों के योग में लट् लकार होता है।