Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 31
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VṛttiGovind
LSK 760
कार्यातिदेशसूत्रम्
कर्मवत् कर्मणा तुल्यक्रियः
Aṣṭādhyāyī 3.1.87
Vṛtti Varadarājācārya

कर्मस्थया क्रियया तुल्यक्रियः कर्ता कर्मवत् स्यात्। कार्यातिदेशोऽयम्। तेन यगात्मनेपदचिण्चिण्वदिटः स्युः। पच्यते फलम्। भिद्यते काष्ठम्। अपाचि। अभेदि। भावे- भिद्यते काष्ठेन।

इति कर्मकर्तृप्रक्रिया॥३१॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अब कर्मकर्तृप्रक्रिया का आरम्भ होता है। भावकर्मप्रक्रिया की तरह इस प्रकरण का भी अनुवाद आदियों में और दैनिक प्रयोग में महत्त्वपूर्ण स्थान है। विवक्षातः कारकाणि भवन्ति। कारक वक्ता की इच्छा के अधीन होते हैं। एक ही वाक्य को कर्ता भिन्न-भिन्न रूप में प्रयोग कर सकता है। जैसे कि अहं काष्ठं भिन्ना मैं लकड़ी तोड़ता हूँ, यह कर्तृवाच्य में मैंने प्रयोग किया। अब इसको कर्मवाच्य में प्रयोग कर सकता हूँ- मया काष्ठं भिद्यते मेरे द्वारा लकड़ी तोड़ी जाती है। अब इसी वाक्य को दूसरे प्रकार से भी कह सकते हैं- भिद्यते काष्ठम् अर्थात् लकड़ी स्वयं टूट रही है। इस तीसरे वाक्य को कर्मकर्ता कहते हैं। जहाँ पर कर्म का प्रयोग कर्ता की तरह किया जाता है, उसे कर्मकर्तृवाच्य कहा जाता है। हिन्दी में भी पैर भूमि में धंसा जा रहा है, कपड़ा फटा जा रहा है।, धागा टूटता चला जा रहा है आदि प्रयोग हम रोज देखते, सुनते हैं।

अब यहाँ पर अन्य प्रकरणों की अपेक्षा इस प्रकरण में होने वाली भिन्नता को बतलाते हैं।

यदा कर्मैव कर्तृत्वेन विवक्षितं तदा सकर्मकाणामप्यकर्मकत्वात् कर्तरि भावे च लकारः। जब वक्ता को कर्म ही कर्तृत्वेन कहना अभीष्ट हो तो सकर्मक धातुएँ भी अकर्मक बन जाती हैं। तब सभी सकर्मक धातुओं के भी अकर्मक होने से उन धातुओं से कर्ता और भाव अर्थ में ही लकार होते हैं अर्थात् जिस प्रकार से लः कर्मणि च भावे

चाकर्मकेभ्यः से सकर्मक धातुओं से कर्ता और कर्म अर्थ में और अकर्मक धातुओं से भाव और कर्ता अर्थ में लकार होते हैं, वैसे ही यहाँ पर कर्मकर्ता होने से धातु के अकर्मक बन जाने के कारण उससे भाव और कर्म अर्थ में ही लकार होते हैं।

७६०- कर्मवत् कर्मणा तुल्यक्रियः। तुल्या क्रिया यस्य स तुल्यक्रियः। कर्मण इव कर्मणि इव वा कर्मवत्। कर्मवत् अव्ययपदं, कर्मणा तृतीयान्तं, तुल्यक्रियः प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। अत्र कर्मणा इत्यनेन कर्मकारकस्था क्रिया विवक्षिता। कर्तरि शप् से विभक्तिविपरिणाम करके कर्ता की अनुवृत्ति आती है।

कर्म में स्थित क्रिया के साथ तुल्य क्रिया वाला कर्ता कर्मवत् होता है।

तात्पर्य यह है कि कर्म के कर्ता बनने के पूर्व जो क्रिया कर्म में स्थित होती है, यदि वही क्रिया अब कर्मकर्तृप्रक्रिया के कर्ता में स्थित हो तो, और यह कब हो सकता है? जब कर्म ही कर्ता बने तब। अतः इसके कर्ता को कर्मवद्भाव हो जाता है। जैसे- देवदत्तः काष्ठं भिनत्ति अर्थात् देवदत्त लकड़ी को तोड़ता है। इस वाक्य में कर्ता है देवदत्तः और कर्म है काष्ठम्। अब इसमें टुकड़े होना रूप जो क्रिया कर्म काष्ठ में स्थित है, वही क्रिया कर्म काष्ठ को कर्तृत्वेन विवक्षा करके प्रयोग करने पर बने हुए कर्ता काष्ठ में भी विद्यमान है, अतः यह तुल्यक्रियकर्ता हो गया। फलतः कर्मवद्भाव हो जाता है। यहाँ तृज्वत् क्रोष्टुः आदि की तरह रूपातिदेश आदि न होकर कार्यातिदेश माना जाता है। अतः कर्ता को कर्मवत् रूप अतिदेश का फल यह निकलता है कि कर्मवाच्य में जो-जो कार्य होते हैं वे सब कार्य कर्मकर्ता में भी हो जायेंगे। कर्मवाच्य में होने वाले कार्य आत्मनेपद, यक्, चिण्, चिण्वदिट् आदि हैं, वे सभी कार्य कर्मकर्ता में भी अतिदिष्ट होते हैं। इस तरह यहाँ कार्यातिदेश सिद्ध माना गया।

पच्यते फलम्। फल स्वयं पकता है। यहाँ पर वस्तुतः कालः फलं पचति ऐसा कर्तृवाच्य का वाक्य बनता है किन्तु अतिशय सौकर्य या सरलता से कहने की वक्ता की अपेक्षा के कारण इस वाक्य को कर्मकर्ता में प्रयोग हुआ। उक्त वाक्य का कर्मकर्ता का वाक्य है- पच्यते फलम्। अर्थात् फल पकता है। पकना रूप जो क्रिया है, कर्मवाच्य और कर्मकर्ता के वाक्य में एक ही फल में अवस्थित है, अतः इसकी कर्मवत् कर्मणा तुल्यक्रियः से कर्मवद्भाव हो गया। फलतः पच् धातु से आत्मनेपद, यक् आदि होकर के पच्यते बना। नहीं तो फलं पचति ऐसा अनिष्ट वाक्य इस कर्मकर्तृविवक्षा में बनता।

और एक बात का ध्यान रखना जरूरी है- पच्यते फलम्, भिद्यते काष्ठम् आदि वाक्य कर्मकर्तृवद्भाव करने के बाद कर्तृवाच्य का है, न कि भाववाच्य का। अतः काष्ठे पच्येते, काष्ठानि पच्यन्ते, त्वं पच्यसे, अहं पच्ये आदि सभी रूप बनते हैं। कर्म को कर्ता बनाने के बाद वह कर्म कर्ता जैसा रहेगा, वैसे ही क्रियापद भी बनेंगे।

लिट् में पेचे, पेचाते, पेचिरे आदि बनेंगे तो लृट् में कर्मवद्भाव के बावजूद भी स्यसिच्सीयुट्तासिषु भावकर्मणोरुपदेशेऽङ्गनग्रहदृशां वा चिण्वदिट् से चिण्वद्भाव नहीं हुआ, क्योंकि यह धातु उपदेश में अजन्त आदि नहीं है। अतः पक्ता, पक्तारौ, पक्तारः ही बनेगा, इट् आदि नहीं होंगे। आगे लृट् में पक्ष्यते। लोट् में पच्यताम्, लङ् में अपच्यत, विधिलिङ् में पच्येत, आशीर्लिङ् में पक्षीष्ट, लुङ् में अपाचि, अपक्षाताम्, अपक्षत और लृङ् में अपक्ष्यत सिद्ध होता है।

उक्त प्रकार से भिद्यते काष्ठम् लकड़ी अपने आप टूटती है। भिद्यते, बिभिदे, भेत्ता, भेत्स्यति, भिद्यताम्, अभिद्यत, भिद्येत, भित्सीष्ट, अभेदि, अभित्साताम्, अभित्सत, अभेत्स्यत आदि रूप बनाये जा सकते हैं। इसी कर्मकर्तृवाच्य में यदि लकार कर्ता अर्थ में न करके अकर्मक होने से भाव अर्थ में करेंगे तो सभी लकारों के प्रथमपुरुष के एकवचन में ही रूप बनेंगे। लकार के भाव अर्थ में होने से कर्मकर्ता अनुक्त हो जाता है। इसलिए इसमें तृतीया विभक्ति हो जाती है और उस कर्मकर्ता के बदलने पर भी क्रिया हमेशा वही रहेगी जैसा काष्ठेन भिद्यते, काष्ठाभ्यां भिद्यते, काष्ठैर्भिद्यते, त्वया भिद्यते, मया भिद्यते आदि।

कर्मकर्ता का उदाहरण श्रीमद्भागवत के प्रथमस्कन्ध के द्वितीय अध्याय स्पष्टतया दृष्टिगोचर होता है-

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या की

कर्मकर्तृप्रक्रिया पूरी हुई।

अथ लकारार्थ-प्रक्रिया