Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 30
Show
VṛttiGovind
LSK 759
वैकल्पिकनुमागमविधायकं विधिसूत्रम्
विभाषा चिण्णमुलोः
Aṣṭādhyāyī 7.1.69
Vṛtti Varadarājācārya

लभेर्नुमागमो वा स्यात्। अलम्भि, अलाभि॥

इति भावकर्मप्रक्रिया॥३०॥

.....

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७५९- विभाषा चिण्णमुलोः। चिण् च णमुल् च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वश्चिणमुलौ, तयोः।

विभाषा प्रथमान्तं, चिण्णमुलोः सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। लभेश्च से लभेः और इदितो नुम्

धातोः से नुम् की अनृवृत्ति आती है।

चिण् या णमुल् के परे होने पर लभ् धातु को विकल्प से नुम् का आगम

होता है।

अलम्भि, अलाभि। लुङ् में अलभ्+इत बनने के बाद विभाषा चिण्णमुलोः से

नुम् का आगम करके अलम्भ्+इत बना। मकार को अनुस्वार और उसको परसवर्ण करके

चिणो लुक् से त का लोप करके अलम्भि सिद्ध होता है। नुम् न होने के पक्ष में उपधावृद्धि

करके अलाभि बनता है। आगे के रूप- अलप्साताम्, अलप्सत, अलब्धाः, अलप्साताम्,

अलब्ध्वम्, अलप्सि, अलप्स्वहि, अलप्स्महि। लृङ्- अलप्स्यत।

यहाँ लघुसिद्धान्तकौमुदी में केवल भू के रूप दिखाये गये हैं। अब जिज्ञासुओं

के लिए कुछ विशेष धातुओं के कर्तृवाच्य और कर्मवाच्य के रूप यहाँ पर व्याख्या में दिखाये

जा रहे हैं जो लट्, प्रथमपुरुष एकवचन के हैं।

मूलधातु

कर्तृवाच्य

भावकर्म

अर्थ

अर्च्

अर्चति

अर्च्यते

पूजा जाता है।

अस्

अस्ति

भूयते

हुआ जाता है।

आप्

आप्नोति

आप्यते

पाया जाता है।

इङ्

अधीते

अधीयते

पढ़ा जाता है।

इष्

इच्छति

इष्यते

चाहा जाता है।

कथ्

कथयति

कथ्यते

कहा जाता है।

कृ

करोति

क्रियते

किया जाता है।

कृप्

कर्पति

कृष्यते

जोता जाता है।

क्री

क्रीणाति

क्रीयते

खरीदा जाता है।

क्षिप्

क्षिपति

क्षिप्यते

फेंका जाता है।

खाद्

खादति

खाद्यते

खाया जाता है।

गण्

गणयति

गण्यते

गिना जाता है।

गम्

गच्छति

गम्यते

जाया जाता है।

गै

गायति

गीयते

गाया जाता है।

ग्रह्

गृह्णाति

गृह्यते

ग्रहण किया जाता है।

चिन्त्

चिन्तयति

चिन्त्यते

सोचा जाता है।

चुर्

चोरयति

चोर्यते

चुराया जाता है।

ज्ञा

जानाति

ज्ञायते

जाना जाता है।

तृ

तरति

तीर्यते

पार किया जाा है।

त्यज्

त्यजति

त्यज्यते

छोड़ा जाता है।

दह्

दहति

दह्यते

जलाया जाता है।

दा

ददाति

दीयते

रिया जाता है।

दुह

दोग्धि

दुह्यते

दोहा जाता है।

दृश्

पश्यति

दृश्यते

देखा जाता है।

ध्यै

ध्यायति

ध्यायते

ध्यान किया जाता है।

नम्

नमति

नम्यते

नमस्कार किया जाता है।

नी

नयति

नीयते

ले जाया जाता है।

पच्

पचति

पच्यते

पकाया जाता है।

पठ्

पठति

पठ्यते

पढ़ा जाता है।

पा

पिबति

पीयते

पिया जाता है।

पाल्

पालयति

पाल्यते

पाला जाता है।

पूज्

पूजयति

पूज्यते

पूजा किया जाता है।

प्रच्छ्

पृच्छति

पृछ्यते

पूछा जाता है।

बन्ध्

बध्नाति

बध्यते

बाँधा जाता है।

ब्रू

ब्रवीति

उच्यते

कहा जाता है।

भाष्

भाषते

भाष्यते

कहा जाता है।

याच्

याचते

याच्यते

मांगा जाता है।

अनुवाद में इस प्रकरण का बहुत ही उपयोग होता है। भ्वादि से चुरादि और ण्यन्त, सन्नन्त, यङन्त एवं यङ्लुगन्त तक सभी धातुओं से कर्ता अर्थ में लकार होने से इन धातुरूपों को लगाकर जो वाक्य बनते हैं, उन्हें कर्तृवाच्य वाक्य कहा जाता है। अब उन्हीं धातुओं से यदि वे धातु सकर्मक हैं तो कर्म अर्थ में लकार करके कर्मवाच्य के वाक्य बनाये जाते हैं और यदि धातु अकर्मक है तो भाव अर्थ में लकार करके भाववाच्य के वाक्य बनाये जाते हैं। वाक्यों के प्रयोग में भावकर्मवाच्य का प्रयोग बहुत सुन्दर लगता है।

ध्यान रहे कि लकार या प्रत्यय जिस अर्थ में होते हैं, वह अर्थ उक्त होता है और शेष सभी अर्थ अनुक्त होते हैं। कारक में उक्त और अनुक्त बहुत ध्यान रखना पड़ता है। अनुक्त कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है और उक्त कर्म में प्रथमा विभक्ति। अनुक्त कर्ता और अनुक्त करण में तृतीया विभक्ति होती है। जैसे कर्तृवाच्य में रामः ग्रन्थं पठति यह वाक्य है। इस वाक्य में पठ् धातु से लट् लकार कर्ता अर्थ में हुआ है। अतः इस वाक्य का कर्ता उक्त है। एक उक्त होता है तो शेष सभी अनुक्त होते हैं। अतः कर्म आदि सभी अनुक्त हुए। कर्ता में प्रथमा होना सामान्य नियम है, अतः राम से प्रथमा विभक्ति हुई। कर्म अनुक्त है तो कर्मणि द्वितीया से कर्म ग्रन्थ में द्वितीया विभक्ति हुई। यह तो हुआ कर्तृवाच्य का वाक्य। इसी को कर्मवाच्य में बनाते हैं। क्योंकि पठ् धातु सकर्मक है। अतः इससे कर्म अर्थ में लकार होकर लट्, यक्, एत्व आदि करके पठ्यते बनता है। कर्म अर्थ में लकार हुआ है, अतः कर्म उक्त हो गया, शेष सभी अनुक्त हुए। अतः उक्त कर्म में प्रथमा हुई और अनुक्त कर्ता में तृतीया विभक्ति हुई तो वाक्य बना- रामेण ग्रन्थः पठ्यते।

कारक का प्रयोग वक्ता के अधीन में होता है। विवक्षातः कारकाणि भवन्ति। यह कर्ता के अधीन है कि वह वाक्य को कर्तृवाच्य, भाववाच्य या कर्मवाच्य किस रूप में प्रयोग करना चाहता है! उसी रूप में वह बना सकता है।

कर्तृवाच्य

सः भवति

त्वं भवसि

अहं भवामि

रामः ओदनं खादति

त्वं घटं कुरु

त्वं पुस्तकं पठ

अहं जलं न पास्यामि

प्रसिद्धः पुरुषो भवेत्

बालाः पुष्पाणि चिन्वन्ति

भवान् ग्रामं गच्छतु

यूयं कार्यम् अकार्ष्टं

ते देवान् यजेयुः

अहं त्वां नमामि

वयं युवां द्रक्ष्यामः

आवां युष्मान् रक्षेव

त्वं मां परिचितु

भवन्तः आवाम् अजानन्

तौ अस्मान् अस्तौष्टाम्

भाववाच्य या कर्मवाच्य

तेन भूयते।

त्वया भूयते।

मया भूयते।

रामेण ओदनः खाद्यते।

त्वया घटः क्रियताम्।

त्वया पुस्तकं पठ्यताम्।

मया जलं न पास्यते।

प्रसिद्धेन पुरुषेण भूयेत।

बालैः पुष्पाणि चीयन्ते।

भवता ग्रामो गम्यताम्।

युष्माभिः कार्यम् अकारि।

तैः देवाः इज्येरन्।

मया त्वं नम्यसे।

अस्माभिर्युवां द्रक्ष्येथे।

आवाभ्यां यूयं रक्षेध्वम्।

त्वया अहं परिचीयै।

भवद्भिरावामज्ञायावहि।

ताभ्यां वयमस्ताविष्महि।

परीक्षा

विशेष प्रकरण होने के कारण इस परीक्षा में कोई समय निर्धारित नहीं है, फिर भी चिन्तन-मनन करते हुए आपको सामान्यतः तीन दिन में परीक्षा पूरी करनी होगी। ३०० पूर्णाङ्कों की परीक्षा में प्रथमश्रेणी के लिए २७५ से ऊपर, द्वितीयश्रेणी के लिए २४० से ऊपर और तृतीयश्रेणी के २०० से ऊपर अंक प्राप्त करने होंगे।

१. भावकर्मप्रक्रिया पर एक विस्तृत लेख लिखें ५०

२. अलग अलग कर्ता, कर्म और धातुओं का प्रयोग करके भिन्न-भिन्न पुरुष और वचन में कर्तृवाच्य के किन्हीं २५ वाक्यों को बदल कर भावकर्मवाच्य के अर्थ सहित वाक्य बनायें। ५०

३. भू, हस् और शीङ् इन तीन अकर्मक धातुओं के भाववाच्य में अर्थ सहित २५ वाक्य बनायें। ५०

४. अलग-अलग कर्ता और कर्म का प्रयोग करके कर्मवाच्य में अनु+भू, के सभी लकारों के तीनों पुरुषों के सभी वचनों में अर्थ सहित १० वाक्य बनायें। १५०

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या की भावकर्म-प्रक्रिया पूरी हुई।

अथ कर्मकर्तृप्रक्रिया

यदा कर्मैव कर्तृत्वेन विवक्षितं तदा सकर्मकाणामप्यकर्मकत्वात् कर्तरि भावे च लकारः।