Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 30
Show
VṛttiGovind
LSK 758
वैकल्पिकनलोपविधायकं विधिसूत्रम्
भञ्जेश्च चिणि
Aṣṭādhyāyī 6.4.33
Vṛtti Varadarājācārya

नलोपो वा स्यात्। अभाजि, अभञ्जि। लभ्यते।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७५८- भञ्जेश्च चिणि। भञ्जेः षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं, चिणि सप्तम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। जान्तनशां विभाषा से विभाषा और श्नान्नलोपः से नलोपः की अनुवृत्ति आती है।

चिण् के परे होने पर भन्ज् धातु के नकार का विकल्प से लोप होता है। लुङ् में अभन्ज्+इत बना है। भञ्जेश्च चिणि से विकल्प से नकार का लोप हुआ तो अभन्ज्+इत में अत उपधायाः से उपधावृद्धि होकर अभाज्+इत बना। चिणो लुक् से त का लोप होकर अभाजि सिद्ध हुआ। नकार के लोप न होने के पक्ष में उपधा में अकार मिलेगा नहीं, अतः वृद्धि भी नहीं होगी। अतः अभञ्जि बनता है। अभाजि-अभञ्जि, अभाङ्गाताम्, अभङ्गत आदि। लृङ्- अभङ्ग्यत, अभङ्ग्येताम्, अभङ्ग्यन्त आदि।

लभ्यते। डुलभष् प्राप्तौ, यह धातु ध्वादि में पठित है। इत्संज्ञा आदि होकर लभ् बचता है। आत्मनेपदी और अनिट् होने के कारण लभते, लेभे, लब्धा, लप्स्यते, लभताम्, अलभत, लभेत, लप्सीष्ट, अलब्ध, अलप्स्यत आदि रूप कर्तृवाच्य में बनते हैं। सकर्मक

.....

होने के कारण कर्मवाच्य में लकार होकर लभ्यते, लेभे, लब्धा, लप्स्यते, लभ्यताम्,

अलभ्यत, लभ्येत, लप्सीष्ट बनाइये और लुङ् में अगला सूत्र लगाइये-