आदन्तानां युगागमः स्यात् चिणि ज्याति कृति च।
दायिता, दाता। दायिषीष्ट, दासीष्ट। अदायि। अदायिषाताम्। भज्यते।
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७५७- आतो युक् चिण्कृतोः। चिण् च कृत् च तयोरितरेतरद्वन्द्वश्चिण्कृतौ, तयोः। आतः षष्ठ्यन्तं, युक् प्रथमान्तं, चिण्कृतोः सप्तम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। अचो ज्याति से ज्याति की अनुवृत्ति आती है।
चिण् अथवा जित्-णित् कृत् प्रत्यय के परे होने पर आदन्त धातुओं को युक् का आगम होता है।
युक् में उकार और ककार इत्संज्ञक हैं। केवल य् शेष रहता है। कित् होने के कारण धातु का अन्ताववयव होकर बैठता है। ध्यान रहे कि यह आगम केवल आदन्त धातुओं को चिण् या जित्, णित् प्रत्यय के परे रहने पर ही होता है।
दायिता, दाता। दा धातु से भावकर्म में लुट्, त, तासि करके चिण्वदिट् आदि करके दा+इता बना है। चिण्वत् होने के कारण णित् परे मिल जाता है। अतः आतो युक् चिण्कृतोः से धातु के आकार को युक् का आगम हुआ तो दाय्+इता बना। वर्णसम्मेलन होकर दायिता सिद्ध हुआ। चिण्वदिट् न होने के पक्ष में इट् भी नहीं हुआ तो युक् का आगम भी नहीं हुआ। अतः दाता ही रह गया। इसी तरह आशीर्लिङ् में चिण्वदिट् होने के पक्ष में युक् होकर दायिषीष्ट और चिण्वदिट् न होने के पक्ष में दासीष्ट बनता है। इसी तरह लुङ् में अदायि बनता है। इसी के तस् में अदायिषाताम् और चिण्वदिट् न होने के पक्ष में स्थाघ्वोरिच्च से दा के आकार को इकार आदेश होकर अदिषाताम् बनता है। झि में अदायिषत, अदिषत आदि।
सकर्मक दा धातु के कर्मवाच्य के रूप- दीयते। ददे। दायिता-दाता। दायिष्यते-दास्यते।
दीयताम्। अदीयत। दीयेत। दायिषीष्ट-दासीष्ट। अदायि, अदायिषाताम्-अदिषाताम्,
अदायिषत-अदिषत। अदायिष्यत-अदास्यत।
धीयते। इसी तरह की प्रक्रिया डुधाञ् धारणपोषणयोः धातु की है। यह भी जुहोत्यादि का सकर्मक और उभयपदी है। कर्मवाच्य में धा से धीयते, दधे, धायिता-धाता, धायिष्यते-धास्यते, धीयताम्, अधीयत, धीयेत, धायिषीष्ट-धासीष्ट, अधायि, अधायिषाताम्-अधिषाताम्, अधायिषत-अधिषत, अधायिष्यत-अधास्यत।
भन्यते। भञ्जो आमर्दने(भन्ज्) धातु तोड़ना अर्थ में रुधादि में सकर्मक पठित है। इससे कर्मवाच्य में लट्, यक् होकर भन्ज्+यत बना है। अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति से नकार का लोप करके भन्ज्+यत बना। टि को एत्व करके भन्यते सिद्ध होता है। आगे- भन्यते, भन्यन्ते। लिट् में- बभञ्जे, बभञ्जाते, बभञ्जिरे, बभञ्जिषे आदि बन जाते हैं। यह धातु चिण्वदिट् का विषय बनता नहीं है क्योंकि उपदेश अवस्था में अजन्त या हन् आदियों में नहीं आता। वैसे भी यह धातु अनिट् है। अतः लुट् आदि में कर्तृवाच्य की तरह ही भन्ज्+ता में जकार को चोः कुः से कुत्व करके गकार और उसके योग में नकार को अनुस्वार और परसवर्ण होकर डकार करके गकार को खरि च से चर्त्व करके भङ्गा आदि रूप बनते हैं तो लृट् में कुत्व, अनुस्वार, परसवर्ण, षत्व, क्षत्व होकर के भङ्ग्यते बनता है। लोट् आदि में- भन्यताम्, अभन्यत, भन्येत, भङ्क्षीष्ट आदि रूप बनते हैं। लुङ् में अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है-