तपश्च्लेश्चिण् न स्यात् कर्मकर्तर्यनुतापे च। अन्वतप्त पापेन।
घुमास्थेतीत्वम्। दीयते। धीयते। ददे।
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७५६- तपोऽनुतापे च। तप: पञ्चम्यन्तम्, अनुतापे सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। च्ले: सिच् से च्ले:, चिण् ते पद: से चिण्, न रुथ: से न और अच: कर्मकर्तरि से कर्मकर्तरि की अनुवृत्ति आती है।
कर्मकर्ता या पश्चात्ताप अर्थ में तप् धातु से परे च्लि को चिण् आदेश नहीं होता।
कर्मकर्ता का अर्थ अगले प्रकरण से स्पष्ट होगा। यहाँ पर पश्चात्ताप अर्थ में चिण् भावकर्मणो: से प्राप्त चिण् आदेश का निषेध किया जा रहा है। जहाँ पर पश्चात्ताप अर्थ नहीं होगा, वहाँ पर चिण् होकर उदतापि भी बनता है।
अन्वतप्त पापेन। पापी के द्वारा पछताया गया। यहाँ पर अनु पूर्वक तप् धातु का अर्थ पश्चात्ताप करना अर्थ प्रकट हो रहा है। इस लिए लुङ् लकार के अनु+तप्+च्लि+त में चिण् भावकर्मणोः से प्राप्त चिण् ओदश का निषेध किया गया। अतः च्लेः सिच् से सिच् आदेश होकर उसके सकार का झलो झलि से लोप होकर अनु+अतप्त बना। यण् होकर अन्वतप्त सिद्ध हुआ।
यहाँ पर पाप-शब्द पाप वाले पापी पुरुष का वाचक है। पापम् अस्यास्तीति पापः। अशीदिभ्योऽच् से अच् प्रत्यय होकर बना हुआ है। इसका कर्तृवाच्य में पापः अन्वतपत् ऐसा रूप बनता है।
दीयते। डुदाञ् दाने, जुहोत्यादि का सकर्मक धातु है। दा से ददाति आदि रूप बनते हैं। यहाँ कर्मवाच्य में लट्, त, यक् करके दा+यत बना है। घुमास्थागापाजहातिसां हलि से दा के आकार को ईत्त्व होने के बाद टि को एत्व करके दीयते बन जाता है। आगे-दीयेते, दीयन्ते आदि। लिट् में ददे, ददाते, ददिरे, ददिषे आदि बनाइये। लुट् में स्यसिच्सीयुट्तासिषु भावकर्मणोरुपदेशेऽन्ननग्रहदृशां वा चिण्वदिट् च से विकल्प से चिण्वदिट् होने के पक्ष में अग्रिम सूत्र से युक् का आगम होता है।