Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 30
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VṛttiGovind
LSK 752
यक्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
सार्वधातुके यक्
Aṣṭādhyāyī 3.1.67
Vṛtti Varadarājācārya

धातोर्यक्, भावकर्मवाचिनि सार्वधातुके।

भावः क्रिया। सा च भावार्थकलकारेणानूद्यते।

युष्मदस्मद्भ्यां सामानाधिकरण्याभावात् प्रथमः पुरुषः। तिङ्वाच्यक्रियाया

अद्रव्यरूपत्वेन द्वित्वाद्यप्रतीतेन द्विवचनादि किन्त्वेकवचनमेवोत्सर्गतः।

त्वया मया अन्यैश्च भूयते। बभूवे।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७५२- सार्वधातुके यक्। सार्वधातुके सप्तम्यन्तं, यक् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। चिण् भावकर्मणोः से भावकर्मणोः तथा धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् से धातोः की अनुवृत्ति आती है।

भाव या कर्मवाचक सार्वधातुक के परे होने पर धातु से यक् प्रत्यय होता है।

ककार इत्संज्ञक है, य शेष रहता है। कित् के कई फल हैं- गुणवृद्धि का निषेध, सम्प्रसारण आदि।

मूल में- भावः क्रिया। सा च .....किन्त्वेकवचनमेवोत्सर्गतः। त्वया मया अन्यैश्च भूयते। बभूवे। भाव क्रिया को कहते हैं। उस क्रियया का भावार्थक लकार से अनुवाद किया जाता है। युष्मद् और अस्मद् के साथ सामानाधिकरण्य न होने से केवल प्रथम पुरुष ही आता है। तिङ्वाच्य क्रिया के द्रव्यरूप न होने से द्वित्व आदि की प्रतीति नहीं होती, अतः द्विवचन आदि नहीं होगे किन्तु उत्सर्गतः एकवचन ही होगा।

भाव-शब्द का अर्थ क्रिया है। इस भाववाच्य में कर्म नहीं होता। यदि कर्म होगा तो कर्मणि प्रयोग माना जायेगा। भाव अर्थात् क्रिया अद्रव्यरूप होता है। अतः इसमें द्वित्व आदि संख्या की प्रतीति नहीं होती। अतः उत्सर्गतः एकवचन मात्र होता है, क्योंकि संख्या की विवक्षा न होने पर भी पद बनाने के लिए सुप्-तिङ् कोई प्रत्यय का होना आवश्यक होता है। कारण यह है कि अपदं न प्रयुञ्जीत। अपद का प्रयोग नहीं करना चाहिए, अर्थात् विना पद बनाये किसी भी शब्द का लोक में प्रयोग नहीं किया जा सकता, ऐसा नियम है।

भाववाच्य में लकार का युष्मद्, अस्मद् या अन्य किसी के साथ भी सामानाधिकरण्य नहीं होता। अतः मध्यमपुरुष और उत्तमपुरुष नहीं होते, सामान्यतः केवल प्रथमपुरुष होता है। स्मरण रहे कि युष्मद् के साथ सामानाधिकरण होने पर युष्मद्युपपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यम से मध्यमपुरुष और अस्मद् के साथ सामानाधिकरण्य होने पर अस्मद्युत्तमः से उत्तमपुरुष होता है एवं अन्य किसी के साथ सामानाधिकरण्य होने पर प्रथमपुरुष होता है परन्तु जब किसी के साथ भी सामान्याधिकरण्य न हो तो सामान्यतः केवल प्रथमपुरुष का एकवचन होता है। भाववाच्य में भाव अर्थ में प्रत्यय होने से अर्थात् कर्ता या कर्म अर्थ में प्रत्यय न होने से युष्मद्, अस्मद् या अन्य किसी के साथ सामान्याधिकरण नहीं होता। अतः प्रथमपुरुष और एकवचन मात्र होता है, जिससे लट् में भू का केवल भूयते मात्र रूप बनता है। त्वया मया अन्यैश्च भूयते। इसी प्रकार सभी लकारों में प्रथमपुरुष का एकवचन मात्र बनेगा। कर्मवाच्य में तो कर्म के अनुसार पुरुष और वचन होते हैं अर्थात् तीनों पुरुष और तीनों वचन होते हैं। स्मरण रहे कि इस भावकर्मवाच्य में कर्तृ+अर्थ के न होने के कारण कर्तरि शप् आदि से शप् आदि विकरण नहीं होते किन्तु भाव या कर्म अर्थ को बताने वाले सार्वधातुक प्रत्यय के परे रहते किसी भी गण की किसी भी धातु से यक् विकरण ही होता है। इसीलिए भूयते की तरह अदादिगणीय अद् धातु का अद्यते, जुहोत्यादिगणीय हु धातु के हूयते आदि रूप बनते हैं।

भूयते। भू-धातु से भाव अर्थ में वर्तमान में लट् लकार, उसके स्थान पर भावकर्मणोः से आत्मनेपद के विधान होने से भू+त बना। उसकी सार्वधातुकसंज्ञा होने के

वाद सार्वधातुके यक् से यक् हुआ। ककार की इत्संज्ञा, भू+य+त बना। य के कित् होने

के कारण विडन्ति च से गुण का निषेध हुआ। त को टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व होकर

भूयते सिद्ध हुआ। भाव में- त्वया भूयते( तुम होते हो, तुम्हारे द्वारा हुवा जाता है)। मया

भूयते( मैं होता हूँ, मेरे द्वारा हुवा जाता है)। अन्यैर्भूयते( अन्य होते हैं, अन्यों के द्वारा हुवा

जाता है)। तेन भूयते, ताभ्यां भूयते, तैर्भूयते, त्वया भूयते, युवाभ्यां भूयते, युष्माभिर्भूयते,

मया भूयते, आवाभ्यां भूयते, अस्माभिर्भूयते।

लिट् में केवल- बभूवे। भू से लिट्, त, एश्, ए, वुक् का आगम, धातु को द्वित्व,

हलादिशेष, अभ्यास को ह्रस्व, उकार को अकार आदेश, जश्त्व करके बभूव्+ए बना।

वर्णसम्मेलन होकर बभूवे। त्वया मया अन्यैश्च बभूवे। तुम्हारे मेरे एवं अन्यों से हुआ करता

था।