लस्यात्मनेपदम्।
अब भावकर्मप्रक्रिया का आरम्भ करते हैं। लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः से कर्ता, कर्म और भाव अर्थ में लकारों का विधान हुआ है। स्मरण रहे कि सकर्मक धातुओं से कर्ता और कर्म में तथा अकर्मक धातुओं से कर्म और भाव अर्थ में लकार होते हैं। वाक्यों को इसी के आधार पर तीन भागों में बाँटा गया है- कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य। इसके पहले सभी प्रकरणों में धातुओं कर्ता अर्थ में लकार हुए थे। अब भाव और कर्म अर्थों में लकार किये जा रहे हैं। इस स्थिति में जो रूपों में अन्तर आता है, उनके कथन के लिए इस प्रकरण का आरम्भ किया गया है।
यह प्रकरण अनुवाद के लिए अत्यन्त ही उपयोगी है। कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य बनाना इस प्रकरण से समझें।
भाव और कर्म में लकार के स्थान पर आत्मनेपद का प्रयोग होता है। कर्म में लकार करने पर कर्ता तृतीयान्त और कर्म प्रथमान्त हो जाता है। भाववाच्य में कर्ता तृतीयान्त होता है और अकर्मक होने से कर्म होता ही नहीं। इसके लिए कारक प्रकरण को समझना चाहिए।
७५१- भावकर्मणोः। भावश्च कर्म च तयोरितरेतरद्वन्द्वो भावकर्मणी, तयोर्भावकर्मणोः। भावकर्मणोः सप्तम्यन्तमेकपदं सूत्रम्। अनुदात्तङ्कित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।
भाव और कर्म अर्थ में हुए लकार के स्थान पर आत्मनेपद प्रत्यय होते हैं।
इस तरह भाव और कर्म में केवल आत्मनेपद होता है, परस्मैपद नहीं।