Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 29
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VṛttiGovind
LSK 750
परस्मैपदविधायकं सूत्रम्
उपाच्च
Aṣṭādhyāyī 1.3.84
Vṛtti Varadarājācārya

यज्ञदत्तमुपरमति। उपरमयतीत्यर्थः। अन्तर्भावितण्यर्थोऽयम्।

इति परस्मैपदप्रक्रिया॥२९॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७५०-उपाच्च। उपात् पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। व्याङ्परिभ्यो रमः से रमः तथा शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् से कर्तरि और परस्मैपदम् की अनुवृत्ति आती है।

.....

उप उपसर्ग से परे रम् धातु से भी परस्मैपद होता है।

यज्ञदत्तमुपरमति। यज्ञदत्त को हटाता है। यहाँ पर रम् धातु अन्तर्भावितण्यन्तार्थ है। अन्तर्भावितो ण्यन्तस्य अर्थो येन सः। जिसके अन्दर ण्यन्त का अर्थ रखा हुआ है वह धातु अन्तर्भावितण्यन्तार्थ कहलाती है अर्थात् जिस धातु में णिच् प्रत्यय का प्रेरणा आदि अर्थ भी विद्यमान रहता है, ऐसी धातुओं को अन्तर्भावितण्यन्तार्थ कहा जाता है। जैसे यहाँ रम् धातु का केवल रमण करना अर्थ न होकर रमण कराने वाला अर्थ भी है। इसलिए यहाँ पर प्रयुक्त उपरमति का उपरमयति ऐसा अर्थ किया जाता है। इसलिए उप पूर्वक रम् धातु से अन्तर्भावितण्यन्तार्थ अर्थात् णिजन्तप्रक्रिया में णिच् करने से जो प्रेरणा आदि अर्थ निकलता है, वह अर्थ णिच् के किये विना भी निकलने पर उपाच्च से परस्मैपद का विधान किया गया जिससे उपरमति सिद्ध हुआ।

णिच् प्रत्यय न करने पर भी धातुओं के अनेकार्थक होने के कारण कहीं कहीं धात्वर्थ के अन्दर णिच् का अर्थ भी सम्मिलित रहता है। इसी का नाम अन्तर्भावितण्यर्थ है।

परीक्षा

आत्मनेपद और परस्मैपद प्रक्रियाओं का सूत्र, उदाहरण देकर एक परिचय प्रस्तुत करें।

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या की

परस्मैपद-प्रक्रिया पूरी हुई।

अथ भावकर्मप्रक्रिया