परिमृष्यति।
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७४८- परेर्मृषः। परेः पञ्चम्यन्तं, मृषः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् से कर्तरि और परस्मैपदम् की अनुवृत्ति आती है।
परि उपसर्ग से परे मृष् धातु से परस्मैपद होता है।
..... परिमृष्यति। दिवादि में मृष तितिक्षायाम् धातु पठित है। स्वरितेत् होने के कारण कर्त्रभिप्राय क्रियाफल में आत्मनेपद की प्राप्ति थी। उसे बाधकर परेर्मृषः से परस्मैपद हो गया- परिमृष्यति।