Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 29
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VṛttiGovind
LSK 746
परस्मैपदविधायकं सूत्रम्
अभिप्रत्यतिभ्यः क्षिपः
Aṣṭādhyāyī 1.3.80
Vṛtti Varadarājācārya

क्षिप प्रेरणे। स्वरितेत्। अभिक्षिपति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७४६- अभिप्रत्यतिभ्यः क्षिपः। अभिश्च प्रतिश्च अतिश्च तेषामितरेतरद्वन्द्व अभिप्रत्यतयस्तेभ्यः। अभिप्रत्यतिभ्यः पञ्चम्यन्तं, क्षिपः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् से कर्तरि और परस्मैपदम् की अनुवृत्ति आती है।

अभि, प्रति और अति उपसर्गों से परे क्षिप् धातु से कर्ता अर्थ में परस्मैपद होता है।

क्षिप प्रेरणे यह धातु स्वरितेत् है और तुदादिगण में पठित है, जिससे कर्तृगामी क्रियाफल में आत्मनेपद की प्राप्ति थी, उसे बाधने के लिए इस सूत्र का अवतरण है। अन्यत्र उभयपद हो किन्तु अभि, प्रति, अति उपसर्ग से परे हो तो उससे केवल परस्मैपद ही हो।

अभिक्षिपति। अभिभूत करता है, दबाता है। स्वरितेत् होने के कारण प्राप्त उभयपद को बाधकर अभिप्रत्यतिभ्यः क्षिपः से केवल परस्मैपद का विधान किया गया- अभिक्षिपति। इसी तरह प्रतिक्षिपति, अतिक्षिपति भी बनेंगे।