Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 29
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VṛttiGovind
LSK 745
परस्मैपदविधायकं सूत्रम्
अनुपराभ्यां कृञः
Aṣṭādhyāyī 1.3.79
Vṛtti Varadarājācārya

कर्तृगे च फले गन्धनादौ च परस्मैपदं स्यात्। अनुकरोति। पराकरोति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अब परस्मैपदप्रक्रिया का आरम्भ होता है। धातुप्रकरण के आरम्भ में कहा जा चुका है कि धातु से विहित लकारों के स्थान पर परस्मैपद और आत्मनेपद दो तरह के तिङ् प्रत्यय आदेश के रूप में होते हैं। किस तरह के धातुओं से परस्मैपद और किस तरह के धातुओं से आत्मनेपद हो, इसका सामान्य कथन प्रकरण के आदि में ही हो चुका है। सामान्यतया अनुदात्तेत् और डित् धातुओं से अनुदात्तडित आत्मनेपदम् से आत्मनेपद और स्वरितेत् और जित् धातुओं से कर्तृगामी क्रियाफल होने पर आत्मनेपद अन्यथा परस्मैपद का विधान हो चुका है। इस प्रकरण से पूर्व के प्रकरण में आत्मनेपद होने में जो विशेष निमित्त होते हैं, उनका भी कथन किया। भ्वादि के प्रारम्भ में जो धातु आत्मनेपद के लिए निमित्त नहीं बनते, ऐसी धातुओं से परस्मैपद का विधान बताया जा चुका है। अब जिस धातु से सामान्यतया आत्मनेपद या उभयपद प्राप्त है, ऐसे कतिपय धातुओं से केवल परस्मैपद का विधान इस प्रकरण में होता है। यद्यपि अष्टाध्यायी के सूत्रानुसार वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी में इसके लिए अनेक सूत्र बतलाये गये हैं किन्तु लघुसिद्धान्तकौमुदी में केवल छः सूत्रों को दिखाया गया है।

७४५- अनुपराभ्यां कृजः। अनुश्च पराश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वः अनुपरौ, ताभ्याम्। अनुपराभ्यां पञ्चम्यन्तं, कृजः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् से कर्तरि और परस्मैपदम् की अनुवृत्ति आती है।

क्रियाफल के कर्तृगामी होने पर और गन्धन आदि अर्थ होने पर अनु अथवा परा उपसर्ग पूर्वक कृ धातु से परस्मैपद ही होता है।

कृ धातु के जित् होने के कारण स्वरितजित कर्त्रभिप्राये क्रियाफले से आत्मनेपद और परस्मैपद दोनों प्राप्त थे तो इस सूत्र से पुनः परस्मैपद का विधान क्यों किया जा रहा है? इसका समाधान यह है कि कृ धातु से कर्तृगामी क्रियाफल न होने पर परस्मैपद प्राप्त था। क्रियाफल के कर्तृगामी होने पर तो आत्मनेपद प्राप्त था। ऐसी स्थिति में अनु पूर्वक कृ और परा पूर्वक कृ से परस्मैपद ही हो, इसके इस सूत्र का आरम्भ किया गया है। इसलिए क्रियाफल के कर्तृगामी होने या न होने दोनों अवस्थाओं में अनु और परा उपसर्ग से परे कृ धातु से परस्मैपद ही होता है, न कि आत्मनेपद। गन्धन आदि अर्थों में

गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनोपयोगेषु कृञः से आत्मनेपद प्राप्त था, वहाँ पर भी कृ धातु के अनु और परा उपसर्ग पूर्वक होने पर तो परस्मैपद ही हो, इसके लिए भी इस सूत्र का आरम्भ किया गया है।

अनुकरोति। अनुकरण करता है, नकल करता है। पराकरोति। हटाता है, दूर करता है। यहाँ पर कर्तृगामी क्रियाफल में आत्मनेपद प्राप्त था, उसे बाधकर के अनुपराभ्यां कृञः से परस्मैपद हुआ- अनुकरोति, पराकरोति।