Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 28
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VṛttiGovind
LSK 744
आत्मनेपदविधायकं विधिसूत्रम्
गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनोपयोगेषु कृञः
Aṣṭādhyāyī 1.3.32
Vṛtti Varadarājācārya

गन्धनं सूचनम्- उत्कुरुते। सूचयतीत्यर्थः। अवक्षेपणं भर्त्सनम्। श्येनो वर्तिकामुत्कुरुते। भर्त्सयतीत्यर्थः। हरिमुपकुरुते। सेवत इत्यर्थः। परदारान् प्रकुरुते। तेषु सहसा प्रवर्तते। एधो दकस्योपस्कुरुते- गुणमाधत्ते। कथाः प्रकुरुते, प्रकथयतीत्यर्थः। शतं प्रकुरुते, धमार्थं विनियुङ्क्ते। एषु किम्? घटं करोति। भुजोऽनवने। ओदनं भुङ्क्ते। अनवने किम्? महीं भुनक्ति।

इत्यात्मनेपदप्रक्रिया॥२८॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७४४- गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनोपयोगेषु कृतः। गन्धनञ्च, अवक्षेपणञ्च, सेवनञ्च, साहसिक्यञ्च, प्रतियत्नश्च, प्रकथनञ्च, उपयोगश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वो गन्धनावक्षेपणसेवन-साहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनोपयोगास्तेषु। गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनोपयोगेषु सप्तम्यन्तं, कृतः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अनुदात्तङ्ति आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।

गन्धन, अवक्षेपण, सेवन, साहसिक्य, प्रतियत्न, प्रकथन और उपयोग अर्थों में विद्यमान कृ धातु से आत्मनेपद होता है।

यह सूत्र कहता है कि कृ धातु से किसी उपसर्ग के लगने से या वैसे भी इन अर्थों की प्रतीति होती है तो उससे आत्मनेपद ही हो, न कि परस्मैपद। प्रत्येक अर्थ का उदाहरण नीचे दिया जा रहा है।

गन्धनं सूचनम्- गन्धन का अर्थ है- सूचित करना, दूसरे के दोष को प्रकट करना, चुगली करना आदि।

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उत्कुरुते। सूचित करता है, चुगली करता है, दोष प्रकट करता है। उत् उपसर्ग पूर्वक कृ धातु से ऐसा अर्थ बनता है। अतः गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्न-प्रकथनोपयोगेषु कृजः से आत्मनेपद होकर उत्कुरुते बना।

अवक्षेपणं भर्त्सनम्। अवक्षेपण का अर्थ भर्त्सना करना, निन्दा करना, तिरस्कार करना आदि अर्थ है। श्येनो वर्तिकामुत्कुरुते। बाज बटेर का तिरस्कार करता है। उत् उपसर्ग पूर्वक कृ धातु से ऐसा अर्थ भी बनता है। अतः गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्य-प्रतियत्नप्रकथनोपयोगेषु कृजः से आत्मनेपद होकर उत्कुरुते बना।

सेवनम्। सेवा करना। हरिमुपकुरुते। हरि की सेवा करता है। उप उपसर्ग पूर्वक कृ धातु से ऐसा अर्थ बनता है। अतः आत्मनेपद होकर उपकुरुते बना।

साहसिक्यम्। बलपूर्वक विना विचारे किये जाने वाले निन्दित कर्म। परदारान् प्रकुरुते। पराई स्त्रियों में बलात् प्रवृत्त होता है। प्र उपसर्ग पूर्वक कृ धातु से ऐसा अर्थ बनता है। अतः आत्मनेपद होकर प्रकुरुते बना।

प्रतियत्नः। गुणाधान, किसी वस्तु में नये गुण का आधान करना। एधो दकस्योपस्कुरुते। लकड़ी पानी को गरम या गुणयुक्त करती है। उप उपसर्ग पूर्वक कृ धातु से ऐसा अर्थ बनता है। अतः आत्मनेपद और उपात्प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारेषु च से सुट् का आगम होकर उपस्कुरुते बना।

प्रकथनम्। अच्छी तरह से कहना। कथाः प्रकुरुते। कथाओं को भलीभाँति कहता है। प्र उपसर्ग पूर्वक कृ धातु से ऐसा अर्थ बनता है। अतः आत्मनेपद होकर प्रकुरुते बना।

उपयोगः। उपयोग करना, लगाना। शतं प्रकुरुते। सौ रूपये का उपयोग करता है। प्र उपसर्ग पूर्वक कृ धातु से ऐसा अर्थ भी बनता है। अतः आत्मनेपद होकर प्रकुरुते बना।

एषु किम्? घटं करोति। यदि गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्न-प्रकथनोपयोगेषु कृजः में इन अर्थों में ही आत्मनेपद होता है, ऐसा न कहते तो घटं करोति में आत्मनेपद भी हो जाता, जिससे अनिष्ट रूप की सिद्धि होती।

भुजोऽनवने। यह सूत्र रुधादिगण में आ चुका है। पालन से भिन्न अर्थ में भुज् धातु से आत्मनेपद होता है। इस धातु के भक्षण और पालन करना दो अर्थ हैं। भक्षण करना अर्थ में इस सूत्र से आत्मनेपद होकर ओदनं भुङ्क्ते और पालन करना अर्थ में परस्मैपद होकर महीं भुनक्ति बनता है। यदि अनवने न कहते तो महीं भुनक्ति में भी आत्मनेपद होने लगता।

कोई धातु किसी उपसर्ग के लगने से परस्मैपदी से आत्मनेपदी और आत्मनेपदी से परस्मैपदी हो जाता है। किसी शब्द-विशेष के योग में यह व्यवस्था बदल जाती है। इस बात का ध्यान रखना चाहिए।

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या की

आत्मनेपद-प्रक्रिया पूरी हुई।

अथ परस्मैपदप्रक्रिया