Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 28
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VṛttiGovind
LSK 743
किद्वद्भावविधायकमतिदेशसूत्रम्
हलन्ताच्च
Aṣṭādhyāyī 1.2.10
Vṛtti Varadarājācārya

इक्समीपाद्धलः परो झलादिः सन् कित्। निविविक्षते।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७४३- हलन्ताच्च। हल् लुप्तपञ्चमीकं पदम्, अन्तात् पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदं सूत्रम्। इको झल् पूरा सूत्र, रुदविदमुषग्रहिस्वपिप्रच्छः संश्च से सन् और असंयोगाल्लिद् कित् से कित् की अनुवृत्ति आती है।

..... इक् के समीप विद्यमान हल् से परे झलादि सन् को किद्वद्भाव होता है।

सन् में कित्व विद्यमान नहीं रहता क्योंकि ककार ही नहीं है, कित् बनने का प्रश्न ही नहीं है किन्तु उसे कित् बनाकर उसे कित् मानकर के विङ्ति च से लघूपधगुण का निषेध होना अपेक्षित है। अतः आचार्य ने हलन्ताच्च इस अतिदेश सूत्र का अवतरण किया है।

निविविक्षते। नि पूर्वक विश् धातु से आत्मनेपद का विधान नेर्विशः से पहले ही हो चुका है। उस धातु से सन् प्रत्यय करने के बाद भी पूर्ववत्सनः से आत्मनेपद ही होगा। नि+विश् से सन् होने पर विश् के अनुदात्त होने से एकाच उपदेशेऽदात्तात् से इट् का निषेध हुआ है। सन् को आर्धधातुक मानकर विश् को उपधागुण प्राप्त होता है किन्तु हलन्ताच्च से सन् को किद्वद्भाव कर दिये जाने के कारण विङ्ति च से गुण का निषेध हो जाता है। इसके बाद सन्यङोः से धातु को द्वित्व, हलादिशेष करके निविविश्+स बना है। व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राजच्छशां षः से शकार को षत्व करके निविविष्+स बना। षढोः कः सि से षकार के स्थान पर ककार आदेश करके ककार से परे सन् के सकार को षत्व करने पर क् और ष् के संयोग में क्ष् बना तो निविविक्ष बना। इससे आत्मनेपद का विधान होकर निविविक्षते बनता है।