सनः पूर्वो यो धातुस्तेन तुल्यं सन्नन्तादप्यात्मनेपदं स्यात्। एदिधिषते।
७४२- पूर्ववत्सनः। पूर्वेण तुल्यं पूर्ववत्। पूर्ववत् अव्ययपदं, सनः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अनुदात्तङ्कित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।
सन् प्रत्यय से पूर्व जिस धातु से आत्मनेपद हो, सन् प्रत्यय होने के बाद भी उससे आत्मनेपद ही होता है।
जैसे णिजन्त धातुओं से णिचश्च आदि के द्वारा आत्मनेपद का विधान होता है उसी तरह सन् प्रत्यय के बाद क्या हो? इसका उत्तर यह सूत्र देता है। यदि धातु सन् होने के पहले आत्मनेपदी हो तो सन् होने के बाद भी आत्मनेपदी ही हो अर्थात् यह सिद्ध होता है कि पूर्व अवस्था में यदि धातु परस्मैपदी हो तो सन्नन्त हो जाने के बाद भी परस्मैपदी ही होगा। सन् के पूर्व में धातु कैसी है, इसको जानने के लिए किसी अन्य सूत्र की आवश्यकता नहीं है क्योंकि आत्मनेपद के निमित्तों से हीन होने पर शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् से परस्मैपद हो जाता है और आत्मनेपद के निमित्त वाला हो तो उससे आत्मनेपद ही हो जाता है। जैसे कि एध् धातु पहले से ही आत्मनेपदी है। अतः सन्नन्त होने के बाद भी उससे आत्मनेपद ही होता है इसी तरह भू धातु पहले से ही परस्मैपदी है। अतः सन्नन्त होने के बाद भी परस्मैपद ही होता है।
एदिधिषते। आत्मनेपदी एध् धातु से सन्नन्त के बाद भी आत्मनेपद होकर एदिधिषते बना। इसी तरह परस्मैपदी भू धातु से सन्नन्त के बाद भी परस्मैपद होकर बुभूषति बनता है।