Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 28
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VṛttiGovind
LSK 741
आत्मनेपदविधायकं विधिसूत्रम्
दाणश्च सा चेच्चतुर्थ्यर्थे
Aṣṭādhyāyī 1.3.55
Vṛtti Varadarājācārya

सम्पूर्वाद् दाणस्तृतीयान्तेन युक्तादुक्तं स्यात् तृतीया चेच्चतुर्थ्यर्थे।

दास्या संयच्छते कामी।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७४१- दाणश्च सा चेच्चतुर्थ्यर्थे। चतुर्थ्या अर्थश्चतुर्थ्यर्थस्तस्मिन् चतुर्थ्यर्थे। दाणः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, सा प्रथमान्तं, चेत् अव्ययपदं, चतुर्थ्यर्थे सप्तम्यन्तम्, अनेकपदं सूत्रम्। समस्तृतीयायुक्तात् यह पूरा सूत्र और अनुदात्तङ्कित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।

सम् पूर्वक दाण् धातु यदि तृतीयान्त से युक्त हो तो उससे आत्मनेपद होता है परन्तु वह तृतीया यदि चतुर्थी के अर्थ में प्रयुक्त हो तो।

कारक के वार्तिक अशिष्टव्यवहारे दाणः प्रयोगे चतुर्थ्यर्थ्ये तृतीया से अशिष्टव्यवहार-पूर्वक देने में चतुर्थी के अर्थ में तृतीया विभक्ति का विधान होता है। यदि ऐसी ही स्थिति हो और सम् उपसर्ग का योग हो तो दाण् धातु से आत्मनेपद का विधान किया जाता है।

दास्या संयच्छते कामी। कामुक व्यक्ति दासी को रति या अन्य वस्तु देता है। यहाँ पर अशिष्ट व्यवहार है और चतुर्थी के अर्थ में तृतीया का विधान हुआ है। सम् उपसर्ग का योग भी है। अतः दाणश्च सा चेच्चतुर्थ्यर्थ्ये से आत्मनेपद हुआ- दास्या संयच्छते कामी।