Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 28
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VṛttiGovind
LSK 739
आत्मनेपदविधायकं विधिसूत्रम्
उदश्चरः सकर्मकात्
Aṣṭādhyāyī 1.3.53
Vṛtti Varadarājācārya

धर्ममुच्चरते। उल्लङ्घ्य गच्छतीत्यर्थः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७३९- उदश्चरः सकर्मकात्। उदः, चरः, सकर्मकात्, एतानि सर्वाणि पदानि पञ्चम्यन्तानि, त्रिपदं सूत्रम्। अनुदात्तङ्कित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।

उत् उपसर्ग पूर्वक सकर्मक चर धातु से आत्मनेपद होता है।

धर्ममुच्चरते। धर्म का उल्लंघन करके चलता है। भ्वादिगण में चर गतौ भक्षणो च धातु पठित है। आत्मनेपद के निमित्तों से हीन होने के कारण उससे परस्मैपद होता है जिससे चरति आदि रूप बनते हैं। यहाँ पर चर् धातु उत् उपसर्ग से युक्त है और सकर्मक भी। अतः उदश्चरः सकर्मकात् से आत्मनेपद का विधान किया गया, जिससे उच्चरते बना।