सर्पिषो जानीते। सर्पिषोपायेन प्रवर्तत इत्यर्थः।
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७३८- अकर्मकाच्च। अकर्मकात् पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। अपह्नवे ज्ञः से ज्ञः और अनुदात्तङ्कित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।
अकर्मक ज्ञा धातु से आत्मनेपद होता है।
धातूनामनेकार्थाः अर्थात् धातु के अनेक अर्थ होते हैं। धातुपाठ में जो अर्थ निर्देश किया गया है, वह मुख्य अर्थ है। कभी-कभी धातु मुख्य अर्थ को छोड़कर अन्य अप्रधान अर्थों में भी प्रयुक्त हुआ करती है। जैसे कि ज्ञा धातु का जानना यह मुख्य अर्थ है, जिसके जानाति आदि रूप बनते हैं किन्तु कभी-कभी प्रवृत्त होना भी अर्थ बनता है। जानना अर्थ में तो सकर्मक है, उससे परस्मैपद ही होता है किन्तु प्रवृत्त होना अर्थ में
अकर्मक हो जाता है। ऐसी स्थिति में इस सूत्र के द्वारा आत्मनेपद का विधान किया जाता है।
सर्पिषो जानीते। घी के कारण भोजन में प्रवृत्त होता है। सर्पिः का अर्थ घी है। प्रवृत्त होना अर्थ में ज्ञा धातु अकर्मक बन गया है। ऐसी स्थिति में अकर्मकाच्च से आत्मनेपद हुआ- सर्पिषो जानीते। यहाँ पर ज्ञा धातु के योग में करण में षष्ठी होकर सर्पिषः बना है।