शतमपजानीते। अपलपतीत्यर्थः।
७३७- अपह्नवे ज्ञः। अपह्नवे सप्तम्यन्तं, ज्ञः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अनुदात्तङ्कित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।
छिपाना, इनकार करना अर्थ हो तो ज्ञा धातु से आत्मनेपद ही होता है।
ज्ञा धातु क्र्यादिगण में परस्मैपदी है, जिसके जानाति आदि रूप बनते हैं किन्तु यदि इस धातु से छिपाना आदि अर्थ निकले तो उससे आत्मनेपद ही होता है, ऐसा इस सूत्र से कहा गया है। अप उपसर्ग के लगने से इस धातु का छिपाना आदि अर्थ हो जाता है।
शतमपजानीते। सौ को छिपाता है या इनकार करता है। यहाँ पर अप उपसर्ग पूर्वक ज्ञा धातु है। अपह्नवे ज्ञः से आत्मनेपद का विधान हुआ, जिससे अपजानीते बना।