Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 28
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VṛttiGovind
LSK 736
आत्मनेपदविधायकं विधिसूत्रम्
समवप्रविभ्यः स्थः
Aṣṭādhyāyī 1.3.22
Vṛtti Varadarājācārya

संतिष्ठते। अवतिष्ठते। प्रतिष्ठते। वितिष्ठते।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७३६- समवप्रविभ्यः स्थः। सम् च, अवश्च प्रश्च विश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वः समवप्रवयस्तेभ्यः। समवप्रविभ्यः पञ्चम्यन्तं, स्थः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अनुदात्तङ्कित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।

सम्, अव, प्र और वि उपसर्गों से परे स्था धातु से आत्मनेपद होता है।

भ्वादिगण में छा गतिनिवृत्तौ धातु पठित है। धात्वादेः षः सः से षकार के स्थान पर सकार आदेश होने के बाद निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः के नियम से ठकार भी थकार हो गया जिससे स्था बन गया और आत्मनेपद के निमित्तों से हीन होने के कारण उससे परस्मैपद होकर तिष्ठति आदि रूप बन गये थे किन्तु सम्, अव, प्र और वि इन उपसर्गों से परे इस सूत्र से आत्मनेपद का विधान किया गया।

सन्तिष्ठते। रहता है, निवास करता है, ठहरता है। सम् पूर्वक स्था धातु से समवप्रविभ्यः स्थः से आत्मनेपद का विधान होने पर सन्तिष्ठते बना। इसी तरह अवतिष्ठते। रूकता है, प्रतीक्षा करता है। यहाँ पर अव उपसर्ग पूर्वक स्था धातु है। प्रतिष्ठते। प्रस्थान करता है, रवाना होता है, चल पड़ता है। यहाँ पर प्र उपसर्ग पूर्वक स्था धातु है। वितिष्ठते। स्थिर होता है। यहाँ पर वि उपसर्ग है। इन सभी प्रयोगों में समवप्रविभ्यः स्थः से आत्मनेपद का प्रयोग किया गया।