विजयते। पराजयते।
७३५- विपराभ्यां जेः। विश्च पराश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वो विपरौ, ताभ्याम्। विपराभ्यां पञ्चम्यन्तं, जेः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अनुदात्तङ्कित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।
वि और परा उपसर्गों से परे जि धातु से आत्मनेपद होता है।
धातुपाठ के अनुसार जि धातु से आत्मनेपद के निमित्तों से हीन होने के कारण शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् से परस्मैपद होता है किन्तु वि और परा उपसर्ग के परे होने पर इस सूत्र से आत्मनेपद का विधान किया गया।
विजयते। जीतता है। पराजयते। पराजित होता है, घबराता है।
वि पूर्वक जि धातु के रूप- विजयते, विजयेते, विजयन्ते। विजिग्ये, विजिग्याते, विजिग्यिरे। विजेता, विजेतासे। विजेष्यते। विजयताम्, विजयेताम्, विजयन्ताम्, विजयस्व। व्यजयत। विजयेत। विजेषीष्ट। व्यजेष्ट, व्यजेषाताम्, व्यजेषत। व्यजेष्यत।
परा पूर्वक जि धातु के रूप- पराजयते। पराजिग्ये। पराजेता, पराजेतासे। पराजेष्यते। पराजयताम्। पराजयत। पराजयेत। पराजेषीष्ट। पराजेष्ट, पराजेषाताम्, पराजेषत। पराजेष्यत।