परिक्रीणीते। विक्रीणीते। अवक्रीणीते।
७३४- परिव्यवेभ्यः क्रियः। परिश्च विश्च अवश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वः परिव्यवास्तेभ्यः।
परिव्यवेभ्यः पञ्चम्यन्तं, क्रियः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अनुदात्तङ्कित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।
परि, वि और अव उपसर्गों से परे क्री धातु से आत्मनेपद होता है।
क्र्यादिगण का डुक्रीञ् द्रव्यविनिमये धातु है। वहाँ पर जित् होने के कारण स्वरितजितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले से उभयपदी बना हुआ था किन्तु उक्त उपसर्गों के योग में केवल आत्मनेपदी ही होता है, परस्मैपदी अथवा उभयपदी नहीं होता।
परिक्रीणीते। निश्चित समय के लिए खरीदता है। परि पूर्वक क्री धातु से उभयपद प्राप्त था किन्तु परिव्यवेभ्यः क्रियः से केवल आत्मनेपद का ही विधान हुआ- परिक्रीणीते।
विक्रीणीते। बेचता है। वि पूर्वक क्री धातु से उभयपद प्राप्त था किन्तु परिव्यवेभ्यः क्रियः से केवल आत्मनेपद का ही विधान हुआ- विक्रीणीते।
अवक्रीणीते। खरीदता है। अव पूर्वक क्री धातु से उभयपद प्राप्त था किन्तु परिव्यवेभ्यः क्रियः से केवल आत्मनेपद का ही विधान हुआ- अवक्रीणीते।