Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 28
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VṛttiGovind
LSK 732
आत्मनेपदनिषधकं विधिसूत्रम्
न गतिहिंसार्थेभ्यः
Aṣṭādhyāyī 1.3.15
Vṛtti Varadarājācārya

व्यतिगच्छन्ति। व्यतिघ्नन्ति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७३२- न गतिहिंसार्थेभ्यः। गतिश्च हिंसा च तयोरितरेतरद्वन्द्वो गतिहिंसे, गतिहिंसे अर्थों येषां ते गतिहिंसार्थस्तेभ्यः। न अव्ययपदं, गतिहिंसार्थेभ्यः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। कर्तरि कर्मव्यतिहारे से कर्मव्यतिहारे और अनुदात्तङ्कित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।

कर्मव्यतिहार अर्थ होने पर भी गति और हिंसा अर्थ वाले धातुओं से आत्मनेपद नहीं होता।

यह पूर्व सूत्र का अपवाद है। गति अर्थ वाले धातुओं और हिंसा करना अर्थ वाले धातुओं से कर्मव्यतिहार अर्थात् एक के करने योग्य को दूसरा करे तो भी आत्मनेपद नहीं होगा।

व्यतिगच्छन्ति। एक दूसरे की ओर जाते हैं। यहाँ पर कर्मव्यतिहार है और गत्यर्थक धातु है गम्। कर्तरि कर्मव्यतिहारे से आत्मनेपद प्राप्त था, उसका न गतिहिंसार्थेभ्यः से निषेध हुआ तो परस्मैपद ही हुआ- व्यतिगच्छन्ति।

व्यतिघ्नन्ति। एक दूसरे की हिंसा करते हैं। यहाँ पर कर्मव्यतिहार है और हिंसा अर्थ वाला धातु है हन्। कर्तरि कर्मव्यतिहारे से आत्मनेपद प्राप्त था, उसका न गतिहिंसार्थेभ्यः से निषेध हुआ तो परस्मैपद ही हुआ- व्यतिघ्नन्ति। इसी तरह व्यतिसर्पन्ति, व्यतिहिंसन्ति, व्यतिधावन्ति आदि में कर्मव्यतिहार होते हुए गत्यर्थक और हिंसार्थक धातुओं के प्रयोग में आत्मनेपद का निषेध हुआ।