क्रियाविनिमये द्योत्ये कर्तर्यात्मनेपदम्।
व्यतिलुनीते। अन्यस्य योग्यं लवनं करोतीत्यर्थः।
अब आत्मनेपदप्रक्रिया का आरम्भ होता है। धातुप्रकरण के आरम्भ में कहा जा चुका है कि धातु से विहित लकारों के स्थान पर परस्मैपद और आत्मनेपद दो तरह के तिङ् प्रत्यय आदेश के रूप में होते हैं। किस तरह के धातुओं से परस्मैपद और किस तरह के धातुओं से आत्मनेपद हो, इसका सामान्य कथन तिङन्त प्रकरण के आदि में ही हो चुका है। सामान्यतया अनुदात्तेत् और ङित् धातुओं से अनुदात्तङित आत्मनेपदम् से आत्मनेपद और स्वरितेत् और ञित् धातुओं से कर्तृगामी क्रियाफल होने पर आत्मनेपद अन्यथा परस्मैपद का विधान हो चुका है। इसी तरह जो धातु आत्मनेपद के लिए निमित्त नहीं बनता है, ऐसे धातुओं से परस्मैपद का विधान बताया जा चुका है। अब इस प्रकरण में विशेषतया आत्मनेपद का विधान दिखलाते हैं। यद्यपि अष्टाध्यायी के सूत्रानुसार वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी में इसके लिए अनेक सूत्र बतलाये गये हैं किन्तु लघुसिद्धान्तकौमुदी में केवल चौदह सूत्रों को दिखाया गया है।
७३१- कर्तरि कर्मव्यतिहारे। कर्मणो व्यतिहारः कर्मव्यतिहारस्तस्मिन्। कर्तरि सप्तम्यन्तं, कर्मव्यतिहारे सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अनुदात्तङित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।
क्रिया का विनिमय अर्थात् अदला-बदली अर्थ द्योत्य होने पर धातु से कर्तृवाच्य में आत्मनेपद होता है।
एक के योग्य कार्य को दूसरा करने लगे तो उसे कर्मव्यतिहार कहते हैं और एक दूसरे के साथ एक जैसी आपसी क्रिया को भी कर्मव्यतिहार कहते हैं।
व्यतिलुनीते। अन्य के योग्य काटने की क्रिया को कोई अन्य करता है। यहाँ पर वि और अति दो उपसर्ग पूर्वक लूञ् छेदने धातु है। यह धातु क्र्यादिगण में उभयपदी के रूप में पठित है। इसके परस्मैपद में लुनाति आदि तथा आत्मनेपद में लुनीते आदि रूप बनते हैं। प्वादीनां ह्रस्वः से इसको ह्रस्व होता है। इस प्रकरण में केवल इतना ही बतलाया गया
है कि यद्यपि यह धातु उभयपदी है फिर भी यदि इसका अर्थ कर्मव्यतिहार अर्थात् अन्य के योग्य काटने की क्रिया को किसी अन्य के द्वारा होना हो रहा हो तो केवल आत्मनेपद होता है। यहाँ पर केवल आत्मनेपद होता है, यह बतलाया गया। रूपसिद्धि तो तत्तत् प्रकरणों के अनुसार ही करनी चाहिए।