एभ्यो धातुभ्यो नित्यं यक् स्यात् स्वार्थे।
कण्डूञ् गात्रविघर्षणे॥१॥ कण्डूयति। कण्डूयत इत्यादि।
इति कण्ड्वादयः॥२७॥
अब कण्ड्वादिप्रकरण का आरम्भ होता है। कण्डू+आदि=कण्ड्वादि। पाणिनीय गणपाठ में एक कण्ड्वादिगण है। इसके अन्तर्गत आने वाले शब्दों को धातु और प्रातिपदिक दोनों मान लिया गया है। कण्ड्वादि से विहित यक् के कित् होने से यह सिद्ध होता है कि ये धातुएँ हैं, क्योंकि कित् का फल गुणनिषेध है जो धातुओं में ही दीखता है प्रातिपदिकों में नहीं। पुनः कण्डूञ् धातु में दीर्घ ऊकार का होना यह सिद्ध करता है कि यह प्रातिपदिक हैं क्योंकि यदि धातु ही होती तो ह्रस्व उकार होने पर य के परे रहते अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः से दीर्घ हो ही जाता। अतः दीर्घ ऊकार ग्रहण करने का तात्पर्य यह है कि ये प्रातिपदिक भी हैं। प्रातिपदिक मानकर इनके तीनों लिङ्गों में सभी विभक्तियों में रूप चलते हैं और धातु मानकर यक् आदि करके धातु की तरह रूप बनाये जाते हैं।
७३०- कण्ड्वादिभ्यो यक्। कण्डूः+आदिर्येषां ते कण्ड्वादयस्तेभ्यः कण्ड्वादिभ्यः। कण्ड्वादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, यक् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् से वचनविपरिणाम करके धातुभ्यः की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।
कण्डू आदि धातुओं से स्वार्थ में यक् प्रत्यय होता है।
यक् में ककार इत्संज्ञक है, य शेष रहता है।
कण्डूञ् गात्रविघर्षणे। कण्डूञ् धातु शरीर रगड़ने अर्थात् खुजलाने अर्थ में है। ञकार की इत्संज्ञा होती है, कण्डू शेष रह जाता है।
कण्डूयति। कण्डू से कण्ड्वादिभ्यो यक् से यक्, ककार का लोप करके कण्डू+य बना। य की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा करके सार्वधातुकार्धधातुकयोः से ऊकार को गुण प्राप्त था, कित् परे होने के कारण विङ्गति च से गुण का निषेध हो गया। अब कण्डूय ऐसा बना है। सनाद्यन्ता धातवः से इसकी धातुसंज्ञा करके लट्, उसके स्थान पर तिप्, शप् करके कण्डूय+अति बना। अतो गुणे से पररूप करके कण्डूयति सिद्ध हुआ। यह धातु ञित् होने के कारण स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले से उभयपदी हो जाता है। अतः कण्डूयते भी बनता है। आगे के रूप स्वयं बनायें।
लट्- कण्डूयति, कण्डूयते।
लिट्- कण्डूयाञ्चकार, कण्डूयाम्बभूव, कण्डूयामास, कण्डूयाञ्चक्रे।
लुट्- कण्डूयिता, कण्डूयितासि, कण्डूयितासे। लृट्- कण्डूयिष्यति, कण्डूयिष्यते।
लोट्- कण्डूयतु-कण्डूयतात्, कण्डूयताय्। लङ्- अकण्डूयत्, अकण्डूयत।
विधिलिङ्- कण्डूयेत्, कण्डूयेत। आशीर्लिङ्- कण्डूय्यात्, कण्डूयिषीष्ट।
लुङ्- अकण्डूयीत्, अकण्डूयिष्ट। लृङ्- अकण्डूयिष्यत्, अकण्डूयिष्यत।
कण्डू धातु न होकर जब प्रातिपदिक रहता है, तब इसके रूप ऊकारान्त स्त्रीलिङ्ग में वधू शब्द की तरह होते हैं।
ऊकारान्त स्त्रीलिङ्ग कण्डू-शब्द के रूप
विभक्ति
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमा
कण्डूः
कण्डूवौ
कण्डूवः
द्वितीया
कण्डूम्
कण्डूवौ
कण्डूः
तृतीया
कण्डूवा
कण्डूभ्याम्
कण्डूभिः
चतुर्थी
कण्डूवै
कण्डूभ्याम्
कण्डूभ्यः
पञ्चमी
कण्डूवाः
कण्डूभ्याम्
कण्डूभ्यः
षष्ठी
कण्डूवाः
कण्डूवोः
कण्डूनाम्
सप्तमी
कण्डूवाम्
कण्डूवोः
कण्डूपु
सम्बोधन
हे कण्डूः!
हे कण्डूवौ
हे कण्डूवः!
कण्डूवादि गण के कुछ प्रसिद्ध शब्दों के धातु और सुबन्त के रूप देखें-
कण्डूवादि शब्द
धातु रूप और अर्थ
सुबन्त और अर्थ
कण्डू
कण्डूयति=खुजलाता है
कण्डूः=खुजलाहट
सपर
सपर्यति=पूजा करता है
सपर्या=पूजा
मही
महीयते=पूजित होता है
मही=भूमि
सुख
सुखयति=सुखी होता है
सुखम्=सुख
भिषज्
भिषज्यति=चिकित्सा करता है
भिषक्=वैद्य
उपस्
उपस्यति=प्रातः होता है
उषाः=प्रातःकाल
उरस्
उरस्यति=बलवान् होता है
उरः=छाती
पयस्
पयस्यति=गाय दूध देती है
पयः=दूध
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
कण्डूवादि-प्रकरण पूर्ण हुआ।
अथ आत्मनेपदप्रक्रिया