एभ्यः कर्मभ्यः करोत्यर्थे क्यङ् स्यात्। शब्दं करोति शब्दायते॥
गणसूत्रम्- तत्करोति तदाचष्टे। इति णिच्।
गणसूत्रम्- प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमिष्ठवच्च।
प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे णिच् स्यात्, इष्टे यथा प्रातिपदिकस्य पुंवद्ब्राव-
रभाव-टिलोप-विन्मतुब्लोप-यणादिलोप-प्रस्थस्फाद्यादेश-भसंज्ञाः,
तद्वण्णावपि स्युः। इत्यल्लोपः। घटं करोत्याचष्टे वा घटयति।
इति नामधातवः॥२६॥
.....
७२९- शब्दवैरकलहाभ्रकण्वमेघेभ्यः करणे। शब्दश्च वैरञ्च, कलहश्च, अभ्रञ्च, कण्वश्च मेघश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वः शब्दवैरकलहाभ्रकण्वमेघास्तेभ्यः। शब्दवैरकलहाभ्रकण्वमेघेभ्यः पञ्चम्यन्तं, करणे सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। कर्मणो रोमन्थ० से वचनविपरिणाम करके कर्मभ्यः, कर्तुः क्यङ् सलोपश्च से क्यङ् और धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा से वा की अनुवृत्ति आती है।
शब्द, वैर, कलह, अभ्र, कण्व और मेघ इन कर्मों से करना अर्थ में विकल्प से क्यङ् प्रत्यय होता है।
शब्दं करोति शब्दायते। शब्द करता है। कष्ट से कष्टायते की तरह ही क्यङ्, अनुबन्धलोप, धातुसंज्ञा, अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः से दीर्घ करके शब्दाय बनता है। इससे लट्, त, शप्, पररूप, एत्व करके शब्दायते सिद्ध हो जाता है। इसी तरह वैर से वैरायते- वैर करता है, कलह से कलहायते कलह करता है, अभ्र से अभ्रायते मेघ बनता है, कण्व से कण्वायते पाप करता है, मेघ से मेघायते बादल बनता है आदि बनाये जा सकते हैं।
तत्करोति तदाचष्टे। यह गणसूत्र है। यह उसे करता है, उसे कहता है इस अर्थ में प्रातिपदिकों से णिच् प्रत्यय होता है।
प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमिष्ठवच्च। यह भी गणसूत्र है। प्रातिपदिकों से धातु के अर्थ में बहुल से णिच् प्रत्यय हो जाता है साथ ही इष्टन् प्रत्यय के परे रहने पर जो-जो भी कार्य होते हैं वे वे कार्य इस णिच् प्रत्यय के परे रहने पर भी हो जायें।
इष्टन् के परे रहने पर क्या-क्या कार्य हो सकते हैं? उत्तर दिया- इष्टे यथा प्रातिपदिकस्य पुंवद्ब्राव-रभाव-टिलोप-विन्मतुब्लोप-यणादिलोप-प्रस्थस्फाद्यादेश-भसंज्ञाः, तद्वण्णावपि स्युः। अर्थात् इष्टन् प्रत्यय के परे रहने पर जैसे प्रातिपदिक को पुंवद्ब्राव, रभाव, टि का लोप, विन् और मतुप् का लोप, यणादिलोप, प्र-स्थ-स्फ आदि आदेश और भसंज्ञा आदि कार्य होते हैं, वैसे ही णि के परे होने पर भी ये सब कार्य होते हैं।
घटं करोति, घटमाचष्टे घटयति। घड़े को करता, बनाता है या घट को कहता
है। घट इस प्रातिपदिक से तत्करोति तदाचष्टे से णिच् प्रत्यय करके प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमिष्ठवच्च से इष्ठवद्भाव का अतिदेश करके घट+इ में घट के भसंज्ञक न होते हुए भी इष्ठवद्भाव के कारण भसंज्ञा का अतिदेश हुआ। अतः टकारोवर्ती अकार का यस्येति च से लोप हुआ। घट+इ बना। यहाँ णिच् को णित् मानकर के अचो ञ्णिति से वृद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि अचः परस्मिन् पूर्वविधौ से अकार के लोप को स्थानिवद्भाव करके बीच में अकार का व्यवधान दीखता है। अब घटि की धातुसंज्ञा करके णिचश्च से कर्तृगामि क्रियाफल में आत्मनेपद अन्यथा परस्मैपद का विधान होता है। अतः लट्, तिप् या त, शप्, गुण, अयादेश, वर्णसम्मेलन करके घटयति, घटयते सिद्ध हो जाते हैं। इसके भी सभी लकारों के सभी वचनों में रूप बनाये जाते हैं।
रूप- लट्- घटयति, घटयते। लिट्- घटयाञ्चकार, घटयाम्बभूव, घटयामास। लुट्- घटयिता, घटयितासि, घटयितासे। लृट्- घटयिष्यति, घटयिष्यते। लोट्- घटयतु, घटयताम्। लङ्- अघटयत्, अघटयत। विधिलिङ्- घटयेत्, घटयेत। आशीर्लिङ्- घट्यात्, घटिषीष्ट। लुङ्- ण्यन्त होने से णिश्रिदुमुभ्यः कर्तरि चङ् से चङ्, उसके बाद द्वित्वादि होकर- अजघटत्, अजघटत। लृङ्- अघटयिष्यत्, अघटयिष्यत।
इसके बाद अनेक सुबन्तों से नामधातुओं की प्रक्रिया बताई गई है। कहीं उपधा को दीर्घ, कहीं काम्यच् प्रत्यय, कहीं इच्छा अर्थ के अतिरिक्त आचार अर्थ में क्यच्, चतुर्थ्यन्त कष्टशब्द से क्यङ्, शब्दादि शब्दों से क्यङ्, प्रातिपदिकों से णिच् और इष्ठवद्भाव आदि का विधान मिलता है।
नामधातु के लट् प्रथम पुरुष एकवचन के कुछ रूप नीचे दिये जा रहे हैं।
शब्द
नामधात्वर्थ
लट् का रूप
पुत्र
अपने को पुत्र चाहता है
पुत्रीयति
वाच्
अपने लिए वाणी चाहता है
वाचीयति
राजन्
अपने लिए राजा चाहता है
राजीयति
गिर्
अपने लिए वाणी चाहता है
गीर्यति
पुर्
अपने लिए नगर चाहता है
पूर्यति
दिव्
अपने लिए स्वर्ग चाहता है
दिव्यति
पुत्र
अपने लिए पुत्र चाहता है (काम्यच् प्रत्यय)
पुत्रकाम्यति
पुत्र
शिष्य से पुत्र की तरह व्यवहार करता है
पुत्रीयति छात्रम्
विष्णु
ब्राह्मण को विष्णु की तरह मानता है
विष्णूयति द्विजम्
मातृ
दूसरी स्त्री को माता की तरह मानता है
मात्रीयति परकीयाम्
गर्दभ
घोड़े को गदहे की तरह समझता है
गर्दभीयति अश्वम्
प्रासाद
कुटिया को महल की तरह समझता है
प्रासादीयति कुटीम्
कृष्ण
नट कृष्ण की तरह अभिनय करता है
कृष्णति
इदम्
ऐसा व्यवहार करता है
इदामति
कष्ट
कष्ट सहने के लिए तैयार रहता है
कष्टायते
शब्द
शब्द करता है
शब्दायते
वैर
वैर करता है
वैरायते
कलह
कलह करता है
कलहायते
मेघ
मेघ बनता है
मेघायते
घट
घट बनाता है
घटयति
प्रकट
प्रकट करता है
प्रकटयति
दृढ
दृढ करता है
दृढयति
परीक्षा
द्रष्टव्य:- सभी प्रश्न अनिवार्य हैं और उनके अंक भी दिये गये हैं।
१- अपनी पुस्तिका में पुत्र शब्द से बने पुत्रीय इस नामधातु के सारे रूप लिखें। १०
२- शब्दवैरकलहाभ्रकणवमेघेभ्यः करणे इस सूत्र की सोदाहरण व्याख्या करें। १०
३- नामधातु प्रकरण के विषय में एक परिचय दें। १०
४- तत्करोति तदाचष्टे और प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमिष्ठवच्च इन दो गणसूत्रों की सोदाहरण व्याख्या करें। १०
५- उपमानादाचारे तथा सर्वप्रातिपदिकेभ्यः क्विब्वा वक्तव्यः इन सूत्र और वार्तिक का अन्तर स्पष्ट करें। १०
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का नामधातु-प्रकरण पूर्ण हुआ।
अथ कण्ड्वादयः