चतुर्थ्यन्तात् कष्टशब्दादुत्साहेऽर्थे क्यङ् स्यात्।
कष्टाय क्रमते कष्टायते। पापं कर्तुमुत्सहत इत्यर्थः।
७२८- कष्टाय क्रमणे। कष्टाय चतुर्थ्यन्तं, क्रमणे सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। कर्तुः क्यङ् सलोपश्च से क्यङ् तथा धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा से वा की अनुवृत्ति आती है।
चतुर्थ्यन्त कष्ट शब्द से क्रमण अर्थात् उत्साह करना अर्थ में क्यङ् प्रत्यय होता है।
ककार और ङकार की इत्संज्ञा होती है, य शेष रहता है। ङित् होने से आत्मनेपद होता है।
कष्टाय क्रमते- कष्टायते। कष्ट (पाप) करने का उत्साह करता है। कष्ट+ङे इस चतुर्थ्यन्त शब्द से उत्साह करना अर्थ में कष्टाय क्रमणे से क्यङ् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप होने के बाद धातुसंज्ञा, अवयव सुप् का लुक् करके कष्ट+य बना। अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः से दीर्घ होने पर कष्टाय बना। इससे लट्, त, शप्, पररूप, एत्व
करके कष्टायते सिद्ध हो जाता है। आगे सभी लकारों के सभी वचनों के रूप बना सकते हैं। क्यङ् के डित् होने से तदन्त धातु भी आत्मनेपदी हुई।