Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 26
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VṛttiGovind
LSK 727
दीर्घविधायकं विधिसूत्रम्
अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङिति
Aṣṭādhyāyī 6.4.15
Vṛtti Varadarājācārya

अनुनासिकान्तस्योपधाया दीर्घः स्यात् क्वौ झलादौ च क्ङिति।

इदमिवाचरति इदामति। राजेव राजानति। पन्था इव पथीनति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७२७- अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङिति। क्विश्च झल् तयोरितरेतरद्वन्द्वः क्विझलो, तयोः क्विझलोः। क् च ङ् च तयोरितरेतरद्वन्द्वः क्ङौ, तौ इतौ यस्य, यस्मिन् वा स क्ङित्, तस्मिन्। अनुनासिकस्य षष्ठ्यन्तं, क्विझलोः सप्तम्यन्तं, क्ङिति सप्तम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। नोपधायाः से उपधायाः और ढूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से दीर्घः की अनुवृत्ति आती है। अङ्गस्य का अधिकार है।

क्वि या झलादि कित्, ङित् के परे होने पर अनुनासिकान्त अङ्ग के उपधा को दीर्घ होता है।

इदम् इव आचरति- इदामति। इसकी तरह आचरण करता है। इदम् इस कर्ता प्रातिपदिक सर्वनाम से सर्वप्रातिपदिकेभ्यः क्विब्बा वक्तव्यः से क्विप् करके सर्वापहारलोप करने पर इदम् ही बना। धातुसंज्ञा हुई और अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङिति से प्रत्ययलक्षणेन क्वि परे मान कर अनुनासिकान्त उपधा दकारोत्तरवर्ती अकार को दीर्घ हुआ- इदाम् बना। इससे लट्, तिप्, शप् करके इदाम्+अति बना। वर्णसम्मेलन होकर इदामति सिद्ध हुआ।

रूप- लट्- इदामिति। लिट्- इदामाञ्चकार, इदामाम्बभूव, इदामामास। लुट्- इदामिता। लृट्- इदामिष्यति। लोट्- इदामतु। लङ्- ऐदामत्। विधिलिङ्- इदामेत्। आशीर्लिङ्- इदाम्यात्,। लुङ्- ऐदामीत्। लृङ्- ऐदामिष्यत्।

राजा इव आचरति- राजानति। राजा की तरह आचरण करता है। राजन् इस कर्ता प्रातिपदिक से सर्वप्रातिपदिकेभ्यः क्विब्बा वक्तव्यः से क्विप् करके सर्वापहार करने पर राजन् ही बना। धातुसंज्ञा हुई और अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङिति से प्रत्ययलक्षणेन क्वि परे मानकर अनुनासिकान्त उपधा जकारोत्तरवर्ती अकार को दीर्घ हुआ- राजान् बना। इससे लट्, तिप्, शप् करके राजान्+अति बना। वर्णसम्मेलन होकर राजानति सिद्ध हुआ।

रूप- लट्- राजानति। लिट्- राजानाञ्चकार, राजानाम्बभूव, राजानामास। लुट्- राजानिता। लृट्- राजानिष्यति। लोट्- राजानतु। लङ्- अराजानत्। विधिलिङ्- राजानेत्। आशीर्लिङ्- राजान्यात्,। लुङ्- अराजानीत्। लृङ्- अराजानिष्यत्।

पन्था इव आचरति- पथीनति। मार्ग की तरह आचरण करता है। पथिन् इस कर्ता प्रातिपदिक से सर्वप्रातिपदिकेभ्यः क्विब्बा वक्तव्यः से क्विप् करके सर्वापहार करने पर पथिन् ही बना। धातुसंज्ञा हुई और अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङिति से प्रत्ययलक्षणेन क्वि परे मानकर अनुनासिकान्त उपधा थकारोत्तरवर्ती इकार को दीर्घ हुआ- पथीन् बना। इससे लट्, तिप्, शप् करके पथीन्+अति बना। वर्णसम्मेलन होकर पथीनति सिद्ध हुआ।

रूप- लट्- पथीनति। लिट्- पथीनाञ्चकार, पथीनाम्बभूव, पथीनामास। लुट्- पथीनिता। लृट्- पथीनिष्यति। लोट्- पथीनतु। लङ्- अपथीनत्। विधिलिङ्- पथीनेत्। आशीर्लिङ्- पथीन्यात्,। लुङ्- अपथीनीत्। लृङ्- अपथीनिष्यत्।

अब क्यङ् प्रत्यय का विधान बतलाते हैं।