Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 26
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VṛttiGovind
LSK 726
क्यज्-विधायकं सूत्रम्
उपमानादाचारे
Aṣṭādhyāyī 3.1.10
Vṛtti Varadarājācārya

उपमानात् कर्मणः सुबन्तादाचारेऽर्थे क्यच्।

पुत्रमिवाचरति पुत्रीयति छात्रम्। विष्णूयति द्विजम्।

वार्तिकम्- सर्वप्रातिपदिकेभ्य क्विब्बा वक्तव्यः। अतो गुणे।

कृष्ण इवाचरति कृष्णति। स्व इवाचरति स्वति। सस्वौ।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७२६- उपमानादाचारे। उपमानात् पञ्चम्यन्तम्, आचारे सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। सुप आत्मनः क्यच् से सुपः, क्यच् और धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा से कर्मणः और वा की अनुवृत्ति आती है।

उपमानरूप कर्म सुबन्त से आचार अर्थ में विकल्प से क्यच् प्रत्यय होता है।

जिससे उपमा दी जाती है, उसे उपमान कहते हैं। सुप आत्मनः क्यच् से इच्छा अर्थ में और यहाँ इस सूत्र से आचार अर्थ में क्यच् का विधान किया गया। प्रक्रिया में किसी तरह की भिन्नता नहीं है। अर्थ में भेद होने के कारण अलग से बताया जा रहा है। अन्तर केवल इतना ही है कि वह इच्छा-क्यच् और यह आचार-क्यच् है। प्रसंग के अनुसार अर्थ किया जाता है। इसके वाक्य में सुबन्त शब्द के बाद इव आचरति जोड़ा जाता है।

पुत्रीयति छात्रम्। पुत्रम् इव आचरति। पुत्र की तरह आचरण करता है अथवा शिष्य के साथ पुत्र का सा व्यवहार करता है। यहाँ पर पुत्र की उपमा दी जा रही है, अतः पुत्र उपमान हुआ और पुत्र+अम् उपमान रूप कर्म सुबन्त हुआ। पुत्र+अम् इस उपमानरूप कर्म सुबन्त से उपमानादाचारे से क्यच् प्रत्यय होने के बाद अनुबन्धलोप, धातुसंज्ञा,

अवयवरूप सुप् अम् का लुक् करके क्यचि च से इत्व करने के बाद लट्, तिप्, शप्, अनुबन्धलोप, पररूप करके पहले की तरह ही पुत्रीयति आदि सभी रूप बनाये जाते हैं।

विष्णूयति द्विजम्। विष्णुम् इव आचरति। ब्राह्मण को विष्णु की तरह मानता है अथवा ब्राह्मण से विष्णु भगवान् का सा व्यवहार रखता है, उसी तरह पूजता है। विष्णु+अम् इस उपमानरूप कर्म सुबन्त से क्यच् करके धातुसंज्ञा, अवयव सुप् का लुक करने के बाद विष्णु+य बना है। विष्णु में अकार न होने के कारण क्यचि च से ईत्त्व नहीं होता किन्तु अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः से यकार के परे होने पर विष्णु के उकार को दीर्घ करने पर विष्णूय बनता है। इससे लट्, तिप्, शप्, पररूप करके विष्णूयति बन जाता है। इसके सभी लकारों में पूर्ववत् रूप बनाये जाते हैं।

रूप- लट्- विष्णूयति। लिट्- विष्णूयाञ्चकार, विष्णूयाम्बभूव, विष्णूयामास। लुट्- विष्णूयिता। लृट्- विष्णूयिष्यति। लोट्- विष्णूयतु। लङ्- अविष्णूयत्। विधिलिङ्- विष्णूयेत्। आशीर्लिङ्- विष्णूयात्। लुङ्- अविष्णूयीत्। लृङ्- अविष्णूयिष्यत्।

अब इसी तरह आचार अर्थ में अनेक रूप बनाये जा सकते हैं। जैसे कि- शत्रुमिवाचरति मित्रम्- शत्रूयति मित्रम् मित्र के साथ शत्रु का व्यवहार करता है। मातरमिवाचरति परस्त्रियम्- मात्रीयति परस्त्रियम् माता की तरह मानता है परस्त्रियों को। मित्रमिवाचरति पुत्रम्- मित्रीयति पुत्रम् पुत्र से मित्र की तरह व्यवहार करता है। प्राकारीयति कुटीम् प्राकारीयति कुटी को महल की तरह मानता है। आदि आदि।

क्यच् की तरह क्विप् प्रत्यय के द्वारा भी आचार अर्थ को प्रकट करने की प्रक्रिया प्राप्त होती है, जिसमें वार्तिक के द्वारा यह प्रत्यय किया जा रहा है-

सर्वप्रातिपदिकेभ्यः क्विब्वा वक्तव्यः। यह वार्तिक है। उपमानरूप सभी प्रातिपदिकों से आचार अर्थ में विकल्प से क्विप् प्रत्यय होता है। क्यच् और क्विप् के विधान में अन्तर यह है कि क्यच् उपमानरूप कर्म प्रातिपदिक से होता है और यह क्विप् उपमानरूप कर्ता प्रातिपदिक से होगा क्योंकि यह वार्तिक महाभाष्य में कर्तुः क्यङ् सलोपश्च में पढ़ा गया है। इस प्रत्यय के लिए सुबन्त होने की आवश्यकता नहीं है, सीधे प्रातिपदिक से ही होता है किन्तु वह कर्ता हो। सुप् न होने के कारण सुपो धातुप्रातिपदिकयोः की भी आवश्यकता नहीं होती। क्विप् में इकार उच्चारणार्थक है, ककार की लशक्वतद्धिते और पकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है तथा अपृक्त वकार का वेरपृक्तस्य से लोप होता है। इस तरह प्रत्यय के सभी वर्णों का लोप हो जाता है, कुछ भी नहीं बचता। इसे सर्वापहार या सर्वापहारलोप कहते हैं। जैसा कि हलन्तपुँल्लिङ्ग में वर्णन आ चुका है। क्विप् प्रत्यय करने का फल यही हुआ कि प्रातिपदिक कर्ता धातु बन गया। आचारार्थक क्विप् को सनादि के अन्तर्गत माना गया है। अतः सनाद्यन्ता धातवः से इसकी धातुसंज्ञा हो जाती है। उसके बाद लट्, तिप्, शप्, पररूप आदि करके रूप सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यह प्रत्यय कर्म में नहीं होता। अतः कृष्णति भक्तम् नहीं बनेगा किन्तु कृष्णति नटः, कृष्णति शिशुः आदि प्रथमान्त समानाधिकरण वाले ही रूप बनाये जाते हैं।

कृष्णति। कृष्ण इवाचरति नटः। नट कृष्ण की तरह आचरण करता है। यहाँ पर उपमानरूप कर्ता प्रातिपदिक से सर्वप्रातिपदिकेभ्यः क्विब्वा वक्तव्यः से क्विप् प्रत्यय,

सर्वापहार लोप, कृष्ण की धातुसंज्ञा, लट्, तिप्, शप्, पररूप करके कृष्णाति सिद्ध होता है। आगे सभी लकारों के रूप बनाये जा सकते हैं।

रूप- लट्- कृष्णाति। लिट्- कृष्णाञ्चकार, कृष्णाम्बभूव, कृष्णामास। लृट्- कृष्णाति। लृट्- कृष्णाति। लोट्- कृष्णाति। लङ्- अकृष्णाति। विधिलिङ्- कृष्णाति। आशीर्लिङ्- कृष्णाति। लृङ्- अकृष्णाति। लृङ्- अकृष्णाति।

स्व इवाचरति स्वति। अपनी तरह ही आचरण करता है। यहाँ उपमानवाचक कर्ता प्रातिपदिक स्व शब्द से आचरण करना अर्थ में सर्वप्रातिपदिकेभ्यः क्विब्बा वक्तव्यः से क्विप्, सर्वापहारलोप, धातुसंज्ञा, लट्, तिप्, शप् करके स्व+अति बना है। पररूप करने पर स्वति बनता है। आगे सभी वचनों के रूप बना लें। लिट् में अनेकाच् न होने के कारण आम् नहीं होता। अतः तिप् के स्थान पर णल् करने के बाद स्व+अ बना। अचो ञ्णिति से अजन्त अकार की वृद्धि होने पर स्वा+अ बना। अब आत औ णलः से णल् के अकार के स्थान पर औकार आदेश होकर स्वा+औ बना। स्वा को द्वित्व, अभ्याससंज्ञा, हलादिशेष, ह्रस्व करके सस्वा+औ बना। वृद्धि होकर सस्वौ बन गया। अचो ञ्णिति से णित् परे रहने पर ही वृद्धि होती है। अतः णल् के अलावा अन्यत्र अतुस् आदि में वृद्धि नहीं होगी किन्तु अतो लोपः से अकार का लोप करके सस्वतुः, सस्वुः, सस्विथ, सस्वथुः, सस्व बनते हैं। उत्तमपुरुष के णल् में सस्वौ बनता है। वस्, मस् में सस्विव, सस्विम।

लृट्- स्विता लृट्- स्विष्यति। लोट्- स्वतु। लङ्- अस्वतु। विधिलिङ्- स्वतु। आशीर्लिङ्- स्व्यात्,। लृङ्- अस्वीत्, अस्विष्टाम्, अस्विषुः। लृङ्- अस्विष्यत्।